ये तीन केस बताते हैं कि कम उम्र में भी हार्ट अटैक जानलेवा साबित हो सकता है। कई मामलों में सीने में दर्द या बेचैनी जैसे लक्षण अचानक सामने आते हैं और देखते ही देखते व्यक्ति की हालत गंभीर हो जाती है। एक्सपट्र्स के अनुसार, बदलती लाइफस्टाइल, लगातार बढ़ता तनाव और फिजिकल एक्सरसाइज की कमी के कारण भी कम उम्र के लोगों में हार्ट अटैक का खतरा बढ़ रहा है। कई मामलों में लोग घर पर बैठे, काम करते या चलते-फिरते अचानक गिर पड़ते हैं और समय पर इलाज नहीं मिलने से उनकी मौत हो जाती है। भास्कर में देखिए इन केसों की सिलसिलेवार पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और डॉक्टर से जानिए, आखिर किस कारण से जा रह युवाओं की जान। पढ़ें रिपोर्ट… पहले समझिए हार्ट अटैक क्या होता है? डॉक्टर्स बोले- मेंटल स्ट्रेस, स्मोकिंग से बढ़ रहा खतरा
पाली के बांगड़ हॉस्पिटल के डॉक्टर सुखदेव चौधरी के अनुसार, हमारी बदलती लाइफस्टाइल युवाओं के दिल पर गंभीर असर डाल रही है। आजकल की लाइफस्टाइल में फास्ट फूड और ज्यादा कैलोरी वाले फूड का सेवन बढ़ गया है, जिससे कम उम्र में ही मोटापा, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल, हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज जैसी समस्याएं पैदा हो रही हैं। इसके अलावा मेंटल स्ट्रेस, स्मोकिंग, नींद की कमी और फिजिकल एक्सरसाइज कम करना भी दिल की बीमारियों के खतरे को कई गुना बढ़ा देता है। कुछ मामलों में पारिवारिक (आनुवंशिक) कारण भी इसके लिए जिम्मेदार होते हैं। जब शरीर में कोलेस्ट्रॉल और अन्य वसायुक्त पदार्थ बढ़ने लगते हैं, तो वे धमनियों (रक्त वाहिकाओं) की दीवारों में जमने लगते हैं। इस स्थिति को मेडिकल टर्म में एथेरोस्क्लेरोसिस कहा जाता है। जैसे-जैसे यह जमाव बढ़ता है, हृदय तक रक्त पहुंचाने वाली धमनियों में रुकावट आने लगती है। यदि किसी समय यह खून की सप्लाई पूरी तरह से या गंभीर रूप से बाधित हो जाए, तो हृदय की मांसपेशियों तक ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती और यही स्थिति हार्ट अटैक का रूप ले लेती है। अब देखिए- हार्ट अटैक के बाद सामने आई पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट बच्चों में जन्मजात हृदय विकार की प्रॉब्लम्स
डॉ. महेंद्र चौधरी, आचार्य एवं विभागाध्यक्ष, फॉरेंसिक मेडिसिन विभाग, महाराणा प्रताप राजकीय मेडिकल कॉलेज, पाली के अनुसार, बच्चों में दिल की गंभीर समस्याओं का एक मुख्य कारण 'जन्मजात हृदय विकार' होता है। इसमें बच्चे के जन्म से ही उसके हृदय की संरचना, वाल्व, चैंबर्स या मुख्य रक्त वाहिकाओं के विकास में कोई न कोई गड़बड़ी रह जाती है। इस वजह से दिल को सामान्य से बहुत अधिक मेहनत करनी पड़ती है, और यदि सही समय पर इलाज न मिले तो गंभीर स्थिति में 'हार्ट फेलियर' तक की नौबत आ सकती है। जन्मजात विकारों के अलावा भी कुछ ऐसी स्थितियां हैं जो बच्चों के दिल को प्रभावित कर सकती हैं। इनमें हृदय की मांसपेशियों की बीमारियां (Cardiomyopathy), दिल की धड़कन का अनियमित होना (Arrhythmia), किसी गंभीर संक्रमण के कारण हृदय की मांसपेशियों को पहुंचा नुकसान और कुछ विशिष्ट आनुवंशिक (Genetic) स्थितियां शामिल हैं। ये सभी कारक बच्चों के हृदय स्वास्थ्य को जोखिम में डाल सकते हैं। सांस फूले तो भी अनदेखी न करें
डॉक्टर्स का कहना है कि लक्षणों की सही समय पर पहचान ही जान बचा सकती है। बच्चों में यदि खेलते या दौड़ते समय असामान्य रूप से सांस फूलना, अचानक बेहोशी, सीने में दर्द, बहुत तेज या अनियंत्रित धड़कन और बिना किसी वजह के अत्यधिक थकान महसूस हो, तो तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए। इसी तरह युवाओं को भी सीने में दर्द या भारीपन, सांस लेने में तकलीफ, अचानक बहुत ज्यादा कमजोरी आना, चक्कर खाकर गिरना या दिल की धड़कन का असामान्य होना जैसे संकेतों को बिल्कुल भी हल्के में नहीं लेना चाहिए। देश में हर साल 28 लाख लोगों की दिल की बीमारियों से मौत
वर्ल्ड हार्ट फेडरेशन (WHF) के मुताबिक, दिल की बीमारियों से हर साल भारत में करीब 28 लाख लोगों की मौत होती है। ‘वर्ल्ड हार्ट फाउंडेशन’, ‘ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज’ और ‘इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च’ (ICMR) के आंकड़ों के मुताबिक, देश में कुल मौतों में करीब 28% हिस्सेदारी कार्डियोवस्कुलर डिजीज की हैं। बचाव के लिए क्या करें?
हार्ट अटैक का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता, लेकिन स्वस्थ जीवनशैली और जोखिम कारकों पर नियंत्रण रखकर इसे काफी कम किया जा सकता है। दिल को स्वस्थ रखने के लिए वजन नियंत्रित रखें, नियमित व्यायाम करें, पौष्टिक भोजन लें, पर्याप्त नींद लें और धूम्रपान से दूर रहें। परिवार में कम उम्र में हृदय रोग का इतिहास है तो डॉक्टर की सलाह से ब्लड प्रेशर, शुगर और कोलेस्ट्रॉल की जांच कराते रहें। किसी भी असामान्य लक्षण को नजरअंदाज न करें और समय पर डॉक्टर से सलाह लें।