सोमवार को मेयर के चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी अनिल कल्ला ने भाजपा प्रत्याशी डॉ. सुरेंद्र सिंह शेखावत को करारी शिकस्त दी। कांग्रेस को 50, जबकि भाजपा को 30 पार्षदों का समर्थन मिला। नगर निगम चुनाव में भाजपा के सिंबल पर 27, कांग्रेस के सिंबल पर 42, रालोपा का एक और 10 निर्दलीय पार्षद जीते थे। भाजपा ने मेयर चुनाव में जीत के लिए जोड़तोड़ समेत हर संभव तरीका आजमाया, लेकिन कल्ला परिवार का राजनीतिक अनुभव भारी पड़ा। भाजपा प्रत्याशी डॉ. सुरेंद्र सिंह शेखावत समेत उनके खेमे के तमाम नेता नामांकन के दिन से ही पार्षदों से अंतरात्मा की आवाज सुनकर वोट करने की अपील कर रहे थे। इस अपील से कांग्रेस खेमे में बेचैनी जरूर थी, लेकिन अंत में पार्षदों का बहुमत कांग्रेस के साथ गया। चुनाव के पहले तक भाजपा 51 से अधिक वोट का दावा कर रही थी। इसके लिए निर्दलीयों के समर्थन के अलावा कांग्रेस खेमे से क्रॉस वोटिंग का दावा था। ये आंकड़े हवाई साबित हुए और पूरी कांग्रेस एकजुट रही। हालांकि जानकारों का कहना है कि दोनों खेमों से क्रॉस वोटिंग हुई। दोनों दलों के रणनीतिकार देर रात तक क्रॉस वोटिंग करने वाले पार्षदों की पहचान करने की कोशिश करते रहे। इस चुनाव परिणाम ने राजनीतिक गलियारों और सट्टा बाजार के तमाम अनुमानों को धड़ाम कर दिया। भाजपा खेमे में मंथन तो कांग्रेस खेमे में जश्न का माहौल है। नवनिर्वाचित मेयर अनिल कल्ला पूर्व कैबिनेट मंत्री डॉ. बीडी कल्ला के भतीजे हैं। सोमवार सुबह सबसे पहले मतदान के लिए भाजपा समर्थित निर्दलीय पार्षदों को लाया गया। इसके बाद कांग्रेस के सभी 42 पार्षद दो कारों और एक बस में एक साथ मतदान केंद्र पहुंचे। उनके तुरंत बाद भाजपा के सभी 27 पार्षद बस से पहुंचे। कांग्रेस पार्षदों के मतदान के बाद भाजपा पार्षदों को ग्रुप में अंदर लाया गया। भाजपा लगातार यह दावा कर रही थी कि उसके पास अपने 27 पार्षदों के अलावा 8 निर्दलीय और कांग्रेस खेमे से 9 से 10 पार्षदों का समर्थन है। नतीजे आए तो तस्वीर पूरी तरह उलट थी। भाजपा को अपने 27 के अलावा मात्र 3 पार्षदों का ही समर्थन मिल सका। 5 बड़े कारण जिससे भाजपा की किलेबंदी ढही 1. हारी बाजी जीतने का अति-उत्साह: जनता ने निगम चुनाव में कांग्रेस को 80 में से 42 सीटें देकर स्पष्ट जननादेश दिया था। भाजपा को जनादेश का सम्मान करना चाहिए था मगर भाजपा ने खुद के 27, 10 निर्दलीय, एक रालोपा के पार्षद को अपने खेमे में लाने के साथ ही कांग्रेस पार्षदों को तोड़ने की रणनीति बनाई। भाजपा के पास खोने को कुछ नहीं था, लेकिन यह बड़ा रिस्क पार्टी के लिए उल्टा पड़ गया। 2. ताबड़तोड़ कार्रवाई से कांग्रेस एकजुट चुनाव से कुछ दिन पहले भाजपा का 38 से 39 पार्षदों के समर्थन का दावा था। इसी बीच कुछ व्यापारियों और होटल कारोबारियों के यहां प्रशासनिक कार्रवाइयों ने समीकरण बदल दिए। कांग्रेस पार्षद मकसूद अहमद, नवरतन डागा, अनीश अली और मनोज विश्नोई को नोटिस मिलने के बाद कांग्रेस एकजुट हो गई। सतर्क कांग्रेस ने अपनी बाड़ेबंदी को सुरक्षित रखा और भाजपा के खेमे में सेंध लगा दी। 3. कांग्रेस में सेंधमारी की कोशिश नाकाम: भाजपा ने बाजार में यह शोर मचा दिया था कि कांग्रेस के 9 से 10 पार्षद क्रॉस वोटिंग करेंगे। इससे एक बार कांग्रेस खेमे में असमंजस की स्थिति बनी, लेकिन कमजोर कड़ियों को संभालने के बाद कांग्रेस ने जोधपुर में बैठी भाजपा की बाड़ेबंदी में ही सेंध लगा दी। जोधपुर में भाजपा के 27 और 8 निर्दलीय (कुल 35) पार्षद ठहरे थे, जहां से कांग्रेस ने करीब 5 पार्षदों को अपने पाले में खींचने में सफलता हासिल की। 4. टिकट वितरण में क्लेश और अंतर्कलह: टिकट वितरण के दौरान ही भाजपा में विरोध के स्वर उठे थे। गलत टिकट वितरण के चलते पार्टी के भीतर असंतोष पनपा, जिसकी गूंज पार्टी मुख्यालय तक पहुंची। चुनाव नतीजों में इसी आंतरिक कलह की झलक देखने को मिली और भाजपा महज 27 सीटों पर सिमट गई। केंद्रीय कानून मंत्री ने चुनाव से दूरी बनाए रखी, पूर्व मंत्री डॉ. बीडी कल्ला अंत तक सक्रिय रहे और उनके राजनीतिक मैनेजमेंट ने बाजी पलट दी। 5. शीर्ष नेतृत्व की सक्रियता में अंतर: निगम चुनाव के दौरान बीकानेर में मुख्यमंत्री का रोड शो हुआ। रामलाल शर्मा बाड़ेबंदी में पहुंचे लेकिन ऐन मौके पर ढिलाई दिखी। भाजपा नेतृत्व ने अपने प्रत्याशी के दावों पर भरोसा किया। जमीनी हकीकत नहीं टटोली। कांग्रेस खेमे में पूर्व सीएम अशोक गहलोत और पीसीसी चीफ डोटासरा ने पार्षदों से संपर्क साधा। डॉ. कल्ला को पूरी छूट देकर मनोबल ऊंचा बनाए रखा। कांग्रेस के जीतने की सबसे बड़ी वजह, सबकी सहमति से प्रत्याशी चुना कांग्रेस की इस बड़ी जीत की नींव सही उम्मीदवार के चयन से पड़ी। जैसलमेर में बाड़ेबंदी के बाद पार्टी की एक विशेष टीम ने वन-टू-वन संवाद किया, जिसमें अधिकांश पार्षदों ने अनिल कल्ला के नाम पर मुहर लगाई। बहुमत की राय के आधार पर टिकट देने का यह फैसला मास्टरस्ट्रोक साबित हुआ। इसके विपरीत भाजपा में सिंबल वितरण से पहले ही अंतर्विरोध खुलकर सामने आ गया था, जो अंततः उनकी हार का बड़ा कारण बना।