पीपलखूंट | करीब 100 साल पहले अगरा भील ने जिस बस्ती की नींव रखी थी, वह सागबारी आज अपनी पुरानी पहचान और जनजातीय संस्कृति को संजोए हुए विकास की राह पर आगे बढ़ रही है। अगरा भील की बसाई इस बस्ती की कहानी केवल एक गांव के बसने की कहानी नहीं है, बल्कि यहां की पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा, लोक-संस्कृति और जनजातीय गौरव से जुड़ी हुई है। गांव में अगरा भील की स्मृति आज भी लोगों के बीच जीवंत है। उनकी प्रतिमा गांव के इतिहास और पुरखों की याद को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम बनी हुई है। बुजुर्ग ग्रामीणों के लिए सागबारी का इतिहास गांव की पहचान है, तो युवाओं के लिए यह अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा है। सागबारी क्षेत्र में जनजातीय चेतना और गौरव को नई पहचान उस समय मिली, जब वर्ष 2023 में बिरसा मुंडा चौराहे पर भगवान बिरसा मुंडा की प्रतिमा का अनावरण किया गया। प्रशासक प्रकाश निनामा और ग्रामीणों की सहभागिता से करीब 2 लाख रुपए की लागत से प्रतिमा स्थापित की गई। प्रतिमा स्थापना के बाद यह स्थान क्षेत्र में जनजातीय गौरव और सामाजिक एकजुटता से जुड़ा प्रमुख स्थल बन गया। पुरानी विरासत के साथ बदल रहा गांव: सागबारी की कहानी अब केवल इतिहास तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में पंचायत क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं का भी विस्तार हुआ है। वर्ष 2023-24 में करीब 35 लाख रुपए की लागत से पंचायत भवन का निर्माण कराया गया। वहीं वर्ष 2026 में राज्य सरकार के बजट से उप स्वास्थ्य केंद्र भवन का निर्माण पूरा हुआ। इससे ग्रामीणों को स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध होने लगी हैं। पंचायत क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों पर भी विधायक मद से निर्माण कार्य कराए गए हैं। आखापुर के दो मंदिरों सहित सागबारी, ठेचला और भे के मंदिर परिसरों में बरादरी एवं अन्य विकास कार्य हुए हैं। इससे धार्मिक आयोजनों और मेलों के दौरान ग्रामीणों को सुविधाएं मिल रही हैं। गांव के लिए विकास का मतलब केवल नए निर्माण नहीं, बल्कि अपनी जड़ों और संस्कृति को साथ लेकर आगे बढ़ना भी है। पंचायत का लेखा-जोखा मुख्यालय से दूरी : 18 किलोमीटर जनसंख्या : 2632 साक्षरता : 61.7 % धार्मिक आस्था का केंद्र - हनुमान मंदिर, आखापुर मुख्य उत्पादन-गेहूं, मक्का, चना, कपास, तुअर, मूंग, उड़द, सोयाबीन।