जयपुर में यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) को लेकर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से विरोध दर्ज कराया गया। बोर्ड की प्रतिनिधि समरा सुल्तान ने कहा कि संविधान नागरिकों को अपने मजहब को मानने और उसका पालन करने की आजादी देता है। उन्होंने कहा कि यूसीसी देश में आपसी सौहार्द और परंपराओं के लिए खतरा बन सकता है। कार्यक्रम में UCC को लेकर बोर्ड की आपत्तियां और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े मुद्दे उठाए गए। यूसीसी के खिलाफ बोर्ड ने अपना जागरूकता अभियान तेज करने की बात कही है। जयपुर के इस्लामिक सेंटर में बोर्ड की सरपरस्ती में ‘तहफ़्फ़ुज़-ए-शरिया’ कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें शरीयत, मुस्लिम पर्सनल लॉ, संविधान और UCC को लेकर वक्ताओं ने अपने विचार रखे। कार्यक्रम में बोर्ड की सदस्य समरा सुल्तान ने UCC के विरोध में बोर्ड के अभियान को लेकर अपना पक्ष रखा। समरा सुल्तान बोलीं- संविधान मजहबी आजादी देता है समरा सुल्तान ने कहा कि UCC को लेकर कई राज्यों में आने वाले वर्षों में लागू किए जाने की चर्चा है, लेकिन बोर्ड इसके खिलाफ लगातार जागरूकता अभियान चला रहा है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 25 का हवाला देते हुए कहा कि नागरिकों को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता दी गई है। संविधान के अनुच्छेद 25 में यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य सहित कुछ संवैधानिक सीमाओं के अधीन है। समरा सुल्तान ने कहा कि यह देश इस्लामिक कानून से नहीं, संविधान से चल रहा है। जब हमारा संविधान हमें मजहबी आजादी देता है तो सरकार UCC के जरिए हमसे हमारी मजहबी आजादी क्यों लेना चाहती है। उन्होंने कहा कि UCC का विरोध किसी अलग धार्मिक कानून को देश में लागू करने की मांग के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक बोर्ड का मानना है कि UCC देश के आपसी सौहार्द और परंपराओं के लिए खतरा बन सकता है। उन्होंने सभी धर्मों के लोगों से इस मुद्दे पर आवाज उठाने की अपील की और कहा कि वह आखिरी सांस तक UCC के खिलाफ खड़ी रहेंगी। यासमीन फारूकी ने उठाए परंपराओं को लेकर सवाल कार्यक्रम में बोर्ड की सदस्य यासमीन फारूकी ने UCC के मुद्दे को केवल मुस्लिम और इस्लाम के संदर्भ में देखने के बजाय संविधान के संदर्भ में देखने की बात कही। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि समान नागरिक संहिता की बात की जा रही है, तो अलग-अलग राज्यों और समुदायों में प्रचलित परंपराओं को लेकर भी समान सवाल क्यों नहीं उठाए जाते। यासमीन फारूकी ने UCC पर चल रही बहस को हिंदू-मुस्लिम मुद्दे में बदलकर राजनीतिक रूप देने का आरोप भी लगाया। फकीरा अतीक बोले- पर्सनल लॉ सीमित क्षेत्र बोर्ड के सदस्य फकीरा अतीक ने कहा कि वर्ष 2021 में विधि आयोग ने भारत में UCC की जरूरत को लेकर अपनी राय रखी थी। हालांकि, UCC पर विधि आयोग की आधिकारिक सार्वजनिक प्रक्रिया अलग-अलग चरणों में हुई है और 2023 में आयोग ने इस विषय पर नया सार्वजनिक नोटिस भी जारी किया था। फकीरा अतीक ने कहा कि UCC का प्रभाव केवल मुसलमानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सभी धर्मों के लोगों पर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि भारत में आपराधिक कानून, यातायात कानून सहित कई क्षेत्रों में समान कानून लागू हैं, जबकि पर्सनल लॉ का दायरा अपेक्षाकृत सीमित है। लिव-इन और परिवार व्यवस्था पर भी चर्चा कार्यक्रम में जलेसा सुल्ताना यासीन ने लिव-इन रिलेशनशिप और परिवार व्यवस्था से जुड़े अदालतों के कुछ फैसलों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों का परिवार व्यवस्था पर असर पड़ने की आशंका है। उन्होंने पश्चिमी देशों में परिवार व्यवस्था के सामने आई चुनौतियों का हवाला देते हुए भारत में भी इसके संभावित प्रभाव को लेकर चिंता जताई। UCC पर जागरूकता अभियान आगे बढ़ाने की बात ‘तहफ़्फ़ुज़-ए-शरिया’ कार्यक्रम के जरिए ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने UCC को लेकर अपने जागरूकता अभियान को आगे बढ़ाने की बात कही। कार्यक्रम में वक्ताओं ने संविधान में दिए गए धार्मिक अधिकारों और पर्सनल लॉ से जुड़े मुद्दों को आम लोगों तक पहुंचाने पर जोर दिया।