बारां के आदिवासी अंचल के मुहाल गांव में बुधवार शाम वर्षों पुरानी लहंगी नृत्य की परंपरा फिर जीवंत हो उठी। युवाओं ने बुजुर्गों के साथ गोल घेरा बनाकर पारंपरिक नृत्य किया। हाथों में लकड़ी के डंडे और कान्हा जी के लोकगीतों की गूंज के बीच ग्रामीणों के कदम थिरके तो पूरा माहौल लोक रंग में रंग गया। खास बात यह रही कि नृत्य की कमान केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही, बल्कि युवाओं ने भी पूरे उत्साह के साथ हिस्सा लेकर अपनी लोक संस्कृति से जुड़ने का संदेश दिया। आधुनिकता के बीच लौटती पुरानी परंपरा मोबाइल और मनोरंजन के बदलते साधनों के कारण ग्रामीण अंचल का पारंपरिक लहंगी नृत्य धीरे-धीरे गुम होता जा रहा था। एक समय गांवों में लहंगी के आयोजन उत्सव जैसे होते थे, जिनमें बुजुर्गों से लेकर युवा तक उत्साह से शामिल होते थे। बदलते दौर में इन आयोजनों की जगह आधुनिक मनोरंजन ने ले ली और यह लोक नृत्य गांवों से दूर होता चला गया। इसी पुरानी परंपरा को फिर से जीवंत करने के लिए मुहाल गांव के ग्रामीणों ने लहंगी नृत्य का आयोजन किया। बुजुर्गों ने सिखाईं लहंगी की बारीकियां आयोजन में बुजुर्गों के साथ युवाओं की भागीदारी ने माहौल को खास बना दिया। युवा पारंपरिक अंदाज में नृत्य करते नजर आए, वहीं बुजुर्ग उन्हें लहंगी नृत्य की बारीकियां सिखाते दिखे। इस दौरान पीढ़ियों के बीच लोक संस्कृति को आगे बढ़ाने का एक अनोखा मेल देखने को मिला। गोल घेरे में नृत्य, डंडों की खनक बनी आकर्षण लहंगी नृत्य की अपनी अलग पहचान है। इसमें ग्रामीण गोल घेरा बनाकर एक साथ नृत्य करते हैं। कान्हा जी के लोकगीतों की धुन पर कदम कभी आगे तो कभी पीछे बढ़ते हैं और पूरा समूह लय के साथ गोल-गोल घूमता है। हाथों में मौजूद लकड़ी के डंडों को ताल के साथ आपस में टकराने से निकलने वाली खनक नृत्य में और रौनक भर देती है। नई पीढ़ी से जुड़ी तो संस्कृति रहेगी जीवित ग्रामीणों का कहना है कि लोक संस्कृति तभी जीवित रह सकती है, जब नई पीढ़ी उसे अपनाए। मुहाल में युवाओं की भागीदारी ने यह उम्मीद जगाई है कि मोबाइल और आधुनिकता के दौर में भी गांवों की पुरानी परंपराएं पूरी तरह खत्म नहीं होंगी। लहंगी नृत्य का यह आयोजन बुजुर्गों की विरासत को युवाओं तक पहुंचाने की एक पहल के रूप में सामने आया।