नगर परिषद के 40 वार्डों में से 38 वार्डों के लिए 9 सितंबर को मतदान के बाद 95 प्रत्याशियों की किस्मत ईवीएम में कैद है। अब 14 सितंबर को मतगणना होगी, लेकिन परिणाम आने से पहले ही शहर की सियासत में चर्चाओं का बाजार पूरी तरह से गर्म है। पानी की गुमटी हो या चाय कोर्नर, हर जगह पार्षदों की हार-जीत की संभावनाओं के साथ ही सभापति और उप सभापति के दावेदारों पर ही चर्चा हो रही है। यह दौर सोशल मीडिया का है और पहली बार इसका पूरा प्रभाव भी चुनाव और उसके बाद भी नजर आ रहा है। कांग्रेसी खेमा लगभग शांत है। लेकिन, भाजपा खेमे में उत्साह कुछ ज्यादा ही दिखाई दे रहा है। भाजपा में लगभग चार से पांच उम्मीदवार जीतने से पहले ही सभापति की दावेदारी कर रहे हैं। कुछ उम्मीदवार तो ऐसे हैं, जो बिना किसी आधार के भी दावेदारी की रेस में कूद पड़े हैं। लेकिन, इनकी लगातार आ रही दावेदारी भरी रीलें सबको चौंका रही है। मतदान के बाद कहीं भाजपा की बढ़त की चर्चा है तो कहीं कांग्रेस को मजबूत बताया जा रहा है। इसी बीच लोग अपने स्तर पर एग्जिट पोल भी तैयार कर रहे हैं। शहरवासी अब केवल यह चर्चा नहीं कर रहे कि सभापति कौन बनेगा, बल्कि यह भी देख रहे हैं कि नया नेतृत्व डूंगरपुर की सड़क, नाली, सफाई, पानी, यातायात, पर्यटन, सुंदरता जैसे मुद्दों पर कितना प्रभावी काम कर पाएगा। 14 सितंबर को मतगणना के साथ वार्डों की तस्वीर साफ हो जाएगी। इसके साथ यह भी पता चलेगा कि भाजपा और कांग्रेस में किसका पलड़ा भारी रहा। लेकिन, सभापति की तस्वीर उसी दिन पूरी तरह साफ होना मुश्किल है। सभापति का चुनाव 21 सितंबर और उपसभापति का चुनाव 22 सितंबर को होना है। ऐसे में 14 सितंबर के बाद भी पार्षदों की संख्या, निर्दलीयों की भूमिका, संभावित समर्थन और राजनीतिक जोड़-तोड़ को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म रहने वाला है। मतदान के बाद शहर के बाजारों, पान की दुकानों, चाय की थड़ियों और प्रमुख चौराहों पर राजनीतिक चर्चा का केंद्र पार्षद नहीं, बल्कि सभापति और उपसभापति की कुर्सी बन गई है। लोग पिछले पांच सालों के कामकाज की तुलना कर रहे हैं। शहर में सड़क, सफाई, पानी, पर्यावरण, पर्यटन और शहर की सुंदरता जैसे मुद्दों को लेकर भी सोशल मीडिया पर बहस चल रही है। चर्चाओं में सभापति का चयन केवल व्यक्तिगत संबंध, गुट या राजनीतिक समीकरण के आधार पर नहीं होना चाहिए। सोशल मीडिया पर आने वाली पोस्ट के जवाब में लोग भी खुलकर राय दे रहे हैं। अधिकांश लोगों का कहना रहा कि विकास और स्वच्छता शहर की पहचान बनी थी। इसका स्वरूप वापस आना चाहिए। इसी विचारधारा के लोगों को काबिज होना चाहिए।