जिला प्रशासन ने 2026 के त्रिस्तरीय पंचायतीराज चुनावों के लिए पंचायत समिति प्रधानों, जिला परिषद सदस्यों और वार्डों के आरक्षण की लॉटरी/आदेश की अंतिम सूची जारी कर दी है। कलेक्टर एवं जिला निर्वाचन अधिकारी गौरव अग्रवाल द्वारा जारी सूची ने जिले के ग्रामीण सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। जिले की कुल 20 पंचायत समितियों में से 15 सीटें अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए सुरक्षित रखी गई हैं, जिनमें से 7 की कमान महिला प्रधानों के हाथों में होगी। इस आरक्षण व्यवस्था ने उदयपुर की राजनीति के समीकरण बदल दिए हैं। आदिवासी बहुल टीएसपी क्षेत्रों (गिर्वा, झाड़ोल, कोटड़ा, खेरवाड़ा आदि) में जहां एसटी वर्ग का एकाधिकार कायम रहा है, वहीं नॉन-टीएसपी बेल्ट में मुकाबला और कड़ा हो गया है। बड़गांव पंचायत समिति को अनारक्षित रखा है, जबकि भींडर, वल्लभनगर और मावली में प्रधान पद अनारक्षित महिला के लिए रखा है। घासा में अनुसूचित जाति (एससी) का प्रधान बनेगा। नए आरक्षण समीकरणों के आते ही वर्षों से जमीन तैयार कर रहे कई दिग्गज नेताओं के सियासी अरमानों पर पानी फिर गया है, वहीं नए व महिला चेहरों के लिए सुनहरा अवसर खुल गया है। बड़गांव में खुला मुकाबला; भींडर, मावली और वल्लभनगर में महिला राज 15 सीटों पर एसटी का वर्चस्व उदयपुर जिले की भौगोलिक व सामाजिक स्थिति के अनुसार टीएसपी क्षेत्र की 15 पंचायत समितियों में अनुसूचित जनजाति का पूर्ण वर्चस्व रहेगा। इनमें नाई, झाड़ोल, ओगणा, देवला, ऋषभदेव, कल्याणपुर और फलासिया जैसी पंचायत समितियों में महिला प्रधान का चयन अनिवार्य होने से स्थानीय राजनीति में मातृ शक्ति का सीधा हस्तक्षेप बढ़ेगा। कुराबड़, गिर्वा, कोटड़ा, सुलाव, गोगुन्दा, सायरा, खेरवाड़ा और नयागांव में दिग्गज प्रत्याशी मैदान में होंगे। इस आरक्षण ने स्थापित पुरुष क्षत्रपों को बैकफुट पर धकेल दिया है। अब पार्टियों को शिक्षित और जनसामान्य में पकड़ रखने वाली महिला कार्यकर्ताओं को आगे लाना होगा।