पर्युषण पर्व जैन धर्म में आत्मशोधन का महापर्व है। इसे आत्मा का कल्पवृक्ष कहा गया है। तेरापंथ धर्मसंघ में आचार्य श्री तुलसी द्वारा प्रदत्त अणुव्रत अभियान को महत्वपूर्ण अवदान बताया गया। कहा गया कि आज का दिन अणुव्रत के छोटे-छोटे नियम समझने का अवसर है। व्रत शब्द का अर्थ केवल भूखा रहना नहीं है। व्रत का अर्थ है वृत्ति पर जीत। भूख लगे फिर भी न खाना जिह्वा व्रत है। क्रोध आए फिर भी गुस्सा न करना कषाय व्रत है। लोभ सताए फिर भी संतोष रखना संतोष व्रत है। आचार्य श्री महाश्रमण जी के वचन बताए गए। कहा गया, व्रत देह को नहीं, मन को तपाता है। मन तपा तो कर्म जला। ये विचार श्री जैन श्वेतांबर तेरापंथी सभा आदर्श नगर, सवाई माधोपुर के तत्वावधान में तेरापंथ भवन आदर्श नगर में आयोजित पर्युषण महापर्व के पांचवें दिन रखे गए। प्रवक्ता उपासक पारसमल दुगड़ ने व्रत चेतना दिवस पर यह बात कही। उन्होंने कहा कि तेरापंथ की परिभाषा में व्रत, अणुव्रत, महाव्रत की श्रृंखला है। श्रावक अणुव्रती बनता है। धीरे-धीरे महाव्रत की ओर बढ़ता है। पर्युषण के 8 दिनों में श्रावक-श्राविकाएं अपनी शक्ति अनुसार एकासन, आयम्बिल, उपवास, बेला, तेला, अठाई जैसे तप करते हैं। व्रत चेतना दिवस याद दिलाता है कि तप सिर्फ पेट का नहीं होना चाहिए। तप पाप का भी होना चाहिए। आचार्य भिक्षु का कथन भी रखा गया। उपासक रमेश कुमार सिंघवी ने कहा कि आज भौतिकता की आंधी है। आदमी सब कुछ खाना चाहता है। सब कुछ पाना चाहता है। सब कुछ देखना चाहता है। व्रत चेतना दिवस कहता है, थोड़ा कम करो। थोड़ा संयम करो।