फ्रांस दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। यहां आधुनिक शहर हैं और शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सरकारी सुविधाओं का बड़ा तंत्र है। इसके बावजूद, सरकार के फैसलों को लेकर यहां बार-बार बड़े आंदोलन होते हैं। कभी पेंशन में बदलाव के खिलाफ लाखों कर्मचारी हड़ताल पर चले जाते हैं, तो कभी ईंधन की कीमतें बढ़ने पर आम लोग सड़कों पर उतर आते हैं। अब स्कूलों की खराब हालत को लेकर शुरू हुआ छात्र आंदोलन महंगाई और सरकारी नीतियों के खिलाफ बड़े विरोध में बदल गया है। आखिर फ्रांस में किसी एक मुद्दे पर शुरू हुआ विरोध इतना बड़ा कैसे हो जाता है? इसके पीछे सिर्फ महंगाई नहीं, बल्कि लोगों की आर्थिक परेशानियां, सरकारी फैसलों से टकराव और राजनीतिक अस्थिरता भी है। इसकी 5 बड़ी वजहें समझिए? इसकी 5 बड़ी वजहें समझिए… 1. विरोध से सरकार को झुकाने का भरोसा फ्रांस में लोग अपनी मांगों के लिए सड़कों पर उतरते हैं, तो कई बार उनके साथ दूसरे वर्गों के लोग भी जुड़ जाते हैं। छात्रों का विरोध कर्मचारियों की हड़ताल में बदल सकता है और फिर इसका असर पूरे देश के कामकाज पर पड़ सकता है। मई 1968 में छात्रों से शुरू हुआ आंदोलन इसका बड़ा उदाहरण है। धीरे-धीरे इसमें मजदूर और कर्मचारी भी शामिल हो गए। करीब 70 लाख से 1 करोड़ तक कर्मचारियों के हड़ताल में शामिल होने के अनुमान मिलते हैं। कारखानों, परिवहन और सरकारी सेवाओं का कामकाज बुरी तरह प्रभावित हुआ। इस आंदोलन ने फ्रांस की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था को हिलाकर रख दिया। 1995 में भी पेंशन सुधारों के खिलाफ कई हफ्तों तक हड़ताल चली। प्रधानमंत्री एलेन जुप्पे की सरकार की योजना के विरोध में रेलवे और दूसरे क्षेत्रों के कर्मचारी काम बंद करके सड़कों पर उतर आए। ट्रेनें और मेट्रो सेवाएं प्रभावित हुईं। आखिरकार सरकार को अपनी योजना के कई अहम हिस्से वापस लेने पड़े। इन घटनाओं ने फ्रांस में विरोध की ताकत को स्थापित किया। लोगों को यह भरोसा मिला कि अगर वे एकजुट होकर अपनी मांगें उठाएं, तो सरकार पर दबाव बनाया जा सकता है। हालांकि, हर आंदोलन में सरकार को पीछे हटना पड़े, ऐसा जरूरी नहीं है। 2. अमीर देश, लेकिन हर परिवार की जेब में पैसा नहीं फ्रांस की अर्थव्यवस्था बड़ी है, लेकिन देश की कुल संपत्ति से यह पता नहीं चलता कि आम परिवार के पास कितना पैसा है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि वहां भी बड़ी संख्या में लोग आर्थिक परेशानियों का सामना कर रहे हैं। फ्रांस की सरकारी संस्था INSEE के मुताबिक, 2024 में देश की मुख्य भूमि में करीब 98 लाख लोग गरीबी रेखा से नीचे रह रहे थे। यह आबादी का 15.4% था। एक व्यक्ति के लिए गरीबी की सीमा 1,337 यूरो मासिक आय थी। यानी इस सीमा से कम आमदनी वाले लोगों को गरीबी की श्रेणी में रखा गया। संपत्ति का बंटवारा भी असमान है। सबसे अमीर 10% परिवारों के पास देश की कुल संपत्ति का करीब 48% हिस्सा है। वहीं, सबसे कम संपत्ति वाले आधे परिवारों के पास कुल संपत्ति का सिर्फ 7% हिस्सा है। ऐसे में जब घर का किराया, बिजली, खाने-पीने की चीजें और ईंधन महंगा होता है, तो कम और मध्यम आमदनी वाले परिवारों का बजट बिगड़ जाता है। लोगों को लगता है कि उनकी कमाई रोजमर्रा के खर्च में ही खत्म हो रही है। 3. सरकारी फैसलों से लोगों की नाराजगी बढ़ी फ्रांस में पेंशन और नौकरी से जुड़े सरकारी फैसले अक्सर बड़े विवाद की वजह बनते हैं। इसकी वजह यह है कि ऐसे फैसलों का सीधा असर लोगों की कमाई, काम करने की उम्र और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा पर पड़ता है। 2023 में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार ने रिटायरमेंट की उम्र 62 से बढ़ाकर 64 साल करने का कानून लागू किया। सरकार का तर्क था कि लोगों के लंबे समय तक जीवित रहने और पेंशन पर बढ़ते खर्च के कारण व्यवस्था को लंबे समय तक चलाने के लिए सुधार जरूरी हैं। लेकिन विरोध करने वालों को लगा कि अब उन्हें पेंशन पाने के लिए दो साल ज्यादा काम करना पड़ेगा। खासकर उन लोगों के लिए यह चिंता बड़ी थी, जिन्होंने कम उम्र में काम शुरू किया था या जो शारीरिक मेहनत वाले काम करते हैं। इस फैसले के खिलाफ देशभर में बड़े प्रदर्शन और हड़तालें हुईं। जब लोगों को लगता है कि सरकारी सुधारों का बोझ मुख्य रूप से कर्मचारियों और आम परिवारों पर पड़ रहा है, तो उनके विरोध की संभावना बढ़ जाती है। 4. स्कूलों की खस्ता हालत भी 2026 में आंदोलन की वजह बनी मौजूदा आंदोलन की शुरुआत स्कूलों की समस्याओं से हुई। छात्रों की शिकायत है कि कई स्कूलों में शिक्षकों की कमी है, कक्षाओं में जरूरत से ज्यादा छात्र हैं और इमारतों व जरूरी सुविधाओं की हालत ठीक नहीं है। कुछ छात्रों ने पढ़ाई के लंबे समय और विश्वविद्यालयों में दाखिले की व्यवस्था पर भी सवाल उठाए हैं। छात्रों के लिए यह सिर्फ स्कूल की इमारत या शिक्षकों की कमी का मामला नहीं है। उन्हें चिंता है कि अगर उन्हें अच्छी शिक्षा नहीं मिली, तो आगे नौकरी और बेहतर भविष्य पाने के अवसर भी प्रभावित हो सकते हैं। लेकिन स्कूलों की समस्याओं का समाधान करने के लिए सरकार को पैसा खर्च करना पड़ता है। फ्रांस पर सरकारी कर्ज का दबाव भी बढ़ रहा है। जून 2026 के अंत में देश का सरकारी कर्ज उसकी GDP के 119% के बराबर था। सरकार को शिक्षा के साथ अस्पतालों, पेंशन, रक्षा और दूसरी सार्वजनिक सेवाओं पर भी खर्च करना पड़ता है। ऐसे में बजट को लेकर फैसले लेना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। 5. राजनीतिक खींचतान से सरकार चलाना मुश्किल फ्रांस में 2024 के संसदीय चुनाव के बाद किसी भी दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। संसद में वामपंथी दलों, राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के समर्थकों और दक्षिणपंथी दलों के बीच सीटें बंट गईं। इससे सरकार के लिए बजट और दूसरी नीतियों को संसद से मंजूरी दिलाना मुश्किल हो गया। इसका असर सरकार की स्थिरता पर भी पड़ा। दिसंबर 2024 में सांसदों ने प्रधानमंत्री मिशेल बार्नियर की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दिया। सितंबर 2025 में प्रधानमंत्री फ्रांस्वा बायरू की सरकार भी बजट और सरकारी कर्ज घटाने की योजना पर हुए विवाद के बाद गिर गई। इसके बाद से बजट को लेकर राजनीतिक दलों के बीच खींचतान जारी रही। इस राजनीतिक खींचतान का असर आम लोगों की समस्याओं पर भी पड़ता है। जब दल सरकारी खर्च, कर और बजट में कटौती पर सहमत नहीं हो पाते, तो शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरी सार्वजनिक सेवाओं को लेकर फैसले अटक जाते हैं। --------------------------- ये खबर भी पढ़ें…. फ्रांस में दुकानों से आईफोन लूटे, पुलिस को दौड़ाया:जोकर, कैप्टन अमेरिका बनकर पहुंचे प्रदर्शनकारी, 143 साल पुरानी इमारत में आग लगाई; 15 PHOTOS फ्रांस में महंगाई के खिलाफ शनिवार को 8 लाख लोग सड़कों पर उतर आए। कई जगह प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की गाड़ियों पर पत्थर फेंके और पुलिसकर्मियों को दौड़ाया। पूरी खबर यहां पढ़ें…