कोई गांव के युवाओं के लिए लाखों की जमीन दान करने का फैसला लिया तो कोई 7 साल तक बड़े सेक्टरों में नौकरी छोड़कर अपने माता-पिता के पास गांव लौट आ गया। बीकानेर जिले में दो अलग-अलग पहल गांव, परिवार और सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ाव की मिसाल पेश कर रहे हैं। जिले के गाढवाला और गिराजसर की ये दो कहानियां लोगों को प्रेरित कर रही हैं। गाढवाला में भामाशाह भीराजराम मेघवाल ने स्टेडियम निर्माण के लिए करीब 6 बीघा जमीन देने का निर्णय लिया है तो वहीं गिराजसर के इंजीनियर फतेह राज सिंह भाटी नौकरी छोड़कर गांव लौटे हैं और अब जिला परिषद सदस्य का चुनाव लड़ रहे हैं। स्टेडियम के लिए 6 बीघा जमीन देने की पहल गाढवाला गांव में आयोजित ग्रामीणों की बैठक में भामाशाह भीराजराम मेघवाल ने स्टेडियम निर्माण के लिए करीब 6 बीघा कृषि भूमि दान करने का निर्णय लिया। ग्रामीणों के अनुसार, लंबे समय से उपयुक्त जमीन उपलब्ध नहीं होने के कारण गांव में स्टेडियम बनाने की योजना आगे नहीं बढ़ पा रही थी। अब जमीन उपलब्ध होने की उम्मीद से गांव के युवाओं को खेल सुविधाएं मिलने का रास्ता खुल सकता है। ग्रामवासी हरि सारण ने बताया- गांव के विकास और युवाओं को खेलकूद के बेहतर अवसर देने के उद्देश्य से भीराजराम मेघवाल आगे आए हैं। बैठक में भंवरलाल गोदारा, मोहनलाल सारण (निवर्तमान सरपंच प्रतिनिधि), पूसाराम सारण, मूलाराम मेघवाल, जेठाराम सारण सहित गांव के पंच और सैकड़ों ग्रामीण मौजूद रहे। मंजू सोलंकी को निर्विरोध सरपंच बनाने पर सहमति बैठक में ग्रामीणों, पंचों और पूर्व सरपंच प्रतिनिधियों ने मंजू सोलंकी को निर्विरोध सरपंच बनाने पर भी सहमति जताई। मंजू सोलंकी, सुनील सोलंकी की पत्नी हैं और भीराजराम मेघवाल के भतीजे की बहू हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, सरपंच पद महिला के लिए आरक्षित है। बैठक के बाद भीराजराम मेघवाल न्यायालय पहुंचे। वहां अशोक सारण, सुंदरलाल सहित अन्य ग्रामीणों की मौजूदगी में भूमि दान से संबंधित आधिकारिक दस्तावेजी प्रक्रिया करवाई गई। ग्रामीणों को उम्मीद है कि स्टेडियम बनने से युवाओं को अभ्यास और अपनी खेल प्रतिभा निखारने के बेहतर अवसर मिलेंगे। 7 साल नौकरी के बाद गांव लौटे इंजीनियर गिराजसर गांव के फतेह राज सिंह भाटी की कहानी भी परिवार और अपनी जड़ों से जुड़ाव की मिसाल पेश करती है। उन्होंने बेंगलुरु स्थित अमृता यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। इसके बाद करीब सात साल तक ऑयल एंड गैस और पावर सेक्टर में काम किया। फतेह राज की दोनों बहनें विदेश में रहती हैं। इनमें से एक कैलिफोर्निया में एप्पल कंपनी में कार्यरत हैं, जबकि दूसरी दुबई में रहती हैं। इसके बावजूद फतेह राज ने अपने माता-पिता के करीब रहने और उनके बुढ़ापे में सहारा बनने के लिए पैतृक गांव गिराजसर लौटने का निर्णय लिया। पैतृक जमीन से गांव में रहना हुआ संभव फतेह राज के अनुसार, पैतृक जमीन को व्यावसायिक लीज पर देने के बाद गांव में रहकर जीवन आगे बढ़ाने का निर्णय व्यावहारिक रूप से संभव हो पाया। अब वह जिला परिषद सदस्य का चुनाव लड़ रहे हैं। उनका फैसला बताता है कि पेशेवर अनुभव और करियर के अवसरों के साथ परिवार के प्रति जिम्मेदारी भी जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। गाढवाला में स्टेडियम के लिए जमीन देने की पहल हो या गिराजसर में इंजीनियर का माता-पिता के पास लौटना, दोनों कहानियां गांव और समाज से जुड़े रहने के अलग-अलग पहलुओं को सामने लाती हैं। एक ओर युवाओं के लिए खेल सुविधाएं विकसित करने की कोशिश है, तो दूसरी ओर परिवार के साथ रहने के लिए अपनी जड़ों की ओर लौटने का फैसला लिया।