जिला मुख्यालय टोंक से अजमेर के बीच दतोब-बोराड़ा होते हुए नए रोडवेज बस रूट के संचालन की मांग जोर पकड़ने लगी है। इसको लेकर ग्रामीणों ने टोंक डिपो और अजमेर डिपो प्रबंधक को अलग अलग मांग पत्र सौंपा है। मांग पत्र में ग्रामीणों ने बताया कि इस मार्ग पर नियमित राजस्थान रोडवेज बस शुरू होने से टोंक और अजमेर के बीच बसे दर्जनों गांव सीधे सार्वजनिक परिवहन से जुड़ जाएंगे। इससे ग्रामीणों को टोंक, नसीराबाद और अजमेर आने-जाने में सुविधा मिलेगी। दतोब, संवारिया, मांदोलाई, पंवालिया के ग्रामीणों ने बताया कि प्रस्तावित मार्ग के अनुसार बस टोंक से रवाना होकर पालड़ा, चूली टोपा, इन्दौकिया, कुहाड़ाखुर्द, हमीरपुर, अलियारी, लक्ष्मीपुरा, तिलांजू, रिण्डिलया, बन का खेड़ा, पंवालिया, मान्दोलाई, दतोब, सवारिया, झाड़ली, मनोहरपुर, बोराड़ा, डबरेला, सनौद और नसीराबाद होते हुए अजमेर पहुंचेगी। ग्रामीणों के अनुसार वर्तमान में कई गांवों से टोंक या अजमेर जाने के लिए निजी वाहनों अथवा अलग-अलग साधनों पर निर्भर रहना पड़ता है। बस सेवा शुरू होने से विद्यार्थियों और नौकरीपेशा लोगों को रोजाना आवागमन में राहत मिलेगी। वहीं अजमेर और नसीराबाद में चिकित्सा सुविधाओं के लिए जाने वाले मरीजों और उनके परिजनों के लिए भी यह रूट महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। किसानों और व्यापारियों को टोंक, नसीराबाद और अजमेर के बाजारों तक पहुंचने में सुविधा व अन्य जरूरी सामान लाने-ले जाने में भी आसानी होगी। भास्कर न्यूज| सोप पारंपरिक खेती के साथ बागवानी अपनाकर सोप निवासी 48 वर्षीय किसान हेमराज धाकड़ ने अपनी कृषि आय बढ़ाई है। उन्होंने 9 बीघा जमीन में बर्फखाना किस्म के करीब 1000 अमरूद के पौधे लगाए हैं। हेमराज के अनुसार, इस बगीचे से सालाना करीब 9 लाख रुपए तक की आय हो रही है। वर्तमान में अमरूद का भाव करीब 40 से 45 रुपए प्रति किलो है। हेमराज ने बताया कि उन्होंने वर्ष 2020 में अमरूद की बागवानी शुरू की थी। गुजरात की नर्सरी से करीब 100 रुपए प्रति पौधे की दर से बर्फखाना किस्म के पौधे खरीदकर लगाए। पौधे लगाने के करीब डेढ़ साल बाद फल आना शुरू हो गया। उत्पादन अच्छा मिलने पर उन्होंने धीरे-धीरे बागवानी का रकबा बढ़ाकर करीब 16 बीघा कर लिया। खेत पर पहुंचकर फसल खरीदते हैं व्यापारी अमरूद तैयार होने पर व्यापारी सीधे खेत पर पहुंचकर ठेके पर अमरुद की फसल खरीद लेते हैं।कई बार बगीचे की फसल ठेके पर भी बेच दी जाती है।इससे उपज को दूर मंडी तक ले जाने की जरूरत नहीं पड़ती। परिवहन और अतिरिक्त मजदूरी का खर्च भी बचता है।खेत पर ही बिक्री होने से किसान को उपज बेचने में सुविधा रहती है। सालाना करीब 2 लाख रुपए खर्च हेमराज के अनुसार खाद,सिंचाई, मजदूरी और अन्य कार्यों पर सालाना करीब 2 लाख रुपए खर्च होते हैं। इसके मुकाबले करीब 9 लाख रुपए की आय हो रही है।खर्च निकालने के बाद करीब 7 लाख रुपए शुद्ध बचत का अनुमान है।उनका कहना है कि पारंपरिक फसलों की तुलना में अमरूद की बागवानी अधिक फायदेमंद साबित हुई है।बागवानी का रकबा बढ़ाने के साथ उनका यह प्रयोग आसपास के किसानों को भी फलदार पौधों की खेती के लिए प्रेरित कर रहा है।