नगर निगम में मेयर और डिप्टी मेयर की लॉबिंग अब जाति, संगठन और व्यक्तिगत पसंद तक सीमित नहीं है। भाजपा विधायकों का इसमें अपना सियासी गणित भी है। विधायक अपने विधानसभा क्षेत्र से मेयर बनाने को लेकर ज्यादा उत्साहित नहीं दिखे, कुछ दावेदारों का विरोध तक हुआ। लेकिन डिप्टी मेयर के लिए वे अपने पसंदीदा पार्षद का नाम आगे बढ़ा रहे हैं। 32 साल में सिर्फ एक बार डिप्टी मेयर रहे घनश्याम शर्मा को सांगानेर से विधानसभा के लिए टिकट मिला, मगर वे चुनाव हार गए। भास्कर ने इसके पीछे का राजनीतिक इतिहास खंगाला तो दिलचस्प तस्वीर सामने आई। जयपुर में मेयर रहे मोहनलाल गुप्ता, अशोक परनामी और अशोक लाहोटी बाद में विधायक बने। पूर्व मेयर शील धाभाई ने कोटपूतली से विधानसभा और ज्योति खंडेलवाल ने जयपुर से लोकसभा चुनाव लड़ा, हालांकि दोनों हार गईं। इसके उलट डिप्टी मेयर की कुर्सी विधानसभा की राजनीति में वैसी सीढ़ी साबित नहीं हुई। मेयर की कुर्सी से विधानसभा तक पहुंचे दावेदार मोहनलाल गुप्ता: जयपुर के पहले मेयर रहे, बाद में किशनपोल से तीन बार विधायक बने। शील धाभाई: मेयर रहने के बाद कोटपूतली से विधानसभा चुनाव लड़ा। अशोक परनामी: मेयर से आदर्श नगर विधायक बने और दो बार विधायक रहे। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष भी रहे। ज्योति खंडेलवाल: मेयर रहने के बाद जयपुर से लोकसभा चुनाव लड़ा। अशोक लाहोटी: मेयर रहते सांगानेर से विधानसभा चुनाव लड़ा और विधायक बने। डिप्टी मेयर रहे घनश्याम शर्मा को विधायक का टिकट मिला, चुनाव हारे पहले डिप्टी मेयर घनश्याम शर्मा को सांगानेर से विधानसभा का टिकट मिला, लेकिन वे चुनाव हार गए। इसके बाद संजय शर्मा और विमल कुमावत डिप्टी मेयर रहे, लेकिन विधानसभा टिकट नहीं मिला। पंकज जोशी डिप्टी मेयर रहने के बाद करीब 11 महीने कार्यवाहक महापौर भी रहे, लेकिन विधानसभा तक नहीं पहुंच सके। मनीष पारीक, मनोज भारद्वाज और पुनीत कर्णावट डिप्टी मेयर रहे। विधानसभा टिकट की दावेदारी के बावजूद मौका नहीं मिला।