सड़क किनारे टपरी के नीचे दरी पर बैठे ये कर्मचारी 22 साल से सत्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इनके 450 साथी अवसाद में दुनिया छोड़ गए। 15 ने रोजगार छिनने से आत्महत्या कर ली, जबकि 20 ऐसे हैं, जो विक्षिप्त हो गए और मंदिरों, धर्मशालाओं के बाहर भीख मांगने को मजबूर हैं। बिना नारेबाजी, बिना शोर के ये कर्मचारी इतने सालों से रोज सुबह आते हैं, दरी बिछाकर मौन बैठते हैं, शाम को घर चले जाते हैं। विरोध का इनका तरीका पूरी तरह गांधीवादी है। उन्हें उम्मीद है उनका सत्य जीतकर रहेगा। राजस्थान के इतिहास में एक धरना ऐसा भी है, जो 11 नवंबर 2005 से यानी लगभग 8000 दिन से रोज चल रहा है। जयपुर मेटल्स राज्य सरकार की मुनाफे वाली कंपनी थी। यहां बिजली के मीटर, वायर व केबल बनते थे। साल 2000 में रातों-रात कंपनी बंद कर दी गई। 1558 मजदूर सड़क पर आ गए। सचिवालय से लेकर कोर्ट-कचहरी तक दौड़े। 5 साल तक कोई सुनवाई नहीं हुई तो 11 नवंबर 2005 से जयपुर रेलवे स्टेशन के पास फैक्ट्री के गेट पर अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया जो जारी है। पूरी जवानी खपा दी, हार नहीं मानी मेटल मजदूर संघ के महामंत्री कन्हैयालाल बताते हैं कि धरना देते-देते 450 से ज्यादा मजदूर भगवान को प्यारे हो गए, जो जवान थे, बूढ़े हो गए। कइयों के पास इलाज तक के पैसे नहीं। भास्कर रिपोर्टर पास ही छोटी सी कुटिया में रह रहे गार्ड परिवार के पास पहुंचा। गार्ड और उनकी पत्नी की असमय मौत हो गई। पीछे दो भाई-बहन फांकाकशी के शिकार हैं। मामला फिलहाल नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में विचाराधीन है। मजदूरों की मांग है कि कंपनी की जमीन बेचकर हर मजदूर को बकाया भुगतान दिया जाए। संघ के अध्यक्ष हनुमान कहते हैं, आश्वासन मिले, पर हक नहीं मिला। 2 अक्टूबर पर यही इनका संदेश है- सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं। हम लड़ते रहेंगे।”