दो दिन बाद 14 सितंबर को मतगणना के साथ ही जयपुर निगम के 7वें बोर्ड की तस्वीर साफ हो जाएगी। रिकॉर्ड तोड़ वोटिंग के बाद भाजपा-कांग्रेस अपने-अपने पक्ष में नतीजों को लेकर कयास लगा रहे हैं और साथ ही निर्दलीयों को साधने के प्रयास भी जारी हैं। भाजपा ने खुद के प्रत्याशियों को बाड़ेबंदी में भेज दिया है। वर्तमान में सोशल मीडिया पर 80 का दशक ट्रेंड कर रहा है। चुनाव नतीजों के इंतजार के बीच भास्कर ने जयपुर का इतिहास खंगाला तो पता चला 80 के दशक में नगर पालिका में चुनाव नहीं हो पाए और पालिका प्रशासक के अधीन रही। 1994 में जयपुर नगर पालिका से नगर निगम हो गया और मोहन लाल गुप्ता पहले मेयर चुने गए। 1870 में स्वायत्त शासन कानून लागू हुआ यूं बात करें तो जयपुर में 157 साल पहले जयपुर नगर परिषद की स्थापना हुई थी। तत्कालीन महाराजा जयपुर के तत्कालीन महाराजा सवाई राम सिंह ने 18 अप्रैल 1869 अपने मित्र लार्ड मेयो से प्रेरित होकर जयपुर नगर परिषद की स्थापना की। इसके बाद लार्ड मेयो ने 1870 में भारत में स्वायत्त शासन संबंधित कानून लागू किया। इस कानून के तहत ही देश के कुछ प्रमुख शहरों में परिषदों की स्थापना की गई थी। 1938 में यहां म्युनिसिपल एक्ट पारित करवाया गया। तत्कालीन जयपुर रियासत में स्वायत्त शासन संबंधित यह प्रथम अधिनियम बना जिसके तहत के निर्वाचकों के अपना प्रतिनिधित्व को चुन कर भेजने का अधिकार मिला। नगर परिषद में सदस्यों की संख्या 26 से बढ़ाकर 30 की गई, लेकिन बोर्ड का अध्यक्ष मनोनीत किया जाता था। जलेबी चौक पर खुला था नगर परिषद कार्यालय जलेबी चौक पर नगर परिषद का पहला कार्यालय खोला गया। म्युनिसिपल एक्ट 1944 में लागू किया था। एक्ट में जयपुर नगर परिषद को काउंसिल कर दिया गया। शहरी सरकार के पहले चुनाव आजादी से पहले 21 जून 1945 को हुए। पं. तिवाड़ी प्रथम निर्वाचित अध्यक्ष बने। हालांकि कार्यकाल अल्पकालिक रहा। इस दौरान पहली बार नगर निगम को चलाने के लिए बाईलाज बनाए गए। सन् 1946 नगर पालिका अध्यक्ष पद पर फिर चुनाव हुए। गुलाबचंद्र कासलीवाल जीते और 1946 से 1950 तक पद पर बने रहे। भंवरलाल शर्मा (1960 के दशक के बाद): राजस्थान के दिग्गज भाजपा नेता भंवरलाल शर्मा वर्ष 1964 में (मात्र 28 वर्ष की आयु में) जयपुर नगर परिषद के अध्यक्ष/चेयरमैन बने थे।