राजस्थान में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की आड़ में किसानों के हक और सरकारी खजाने पर डाका डालने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। बीकानेर जिले में एक के बाद एक सामने आ रहे योजनाबद्ध घोटालों ने समूचे कृषि विभाग, बीमा कंपनियों और पुलिस तंत्र को हिलाकर रख दिया है। ताजा मामला खरीफ 2026 के दौरान सामने आया है, जहां फर्जी गैर-ऋणी बंटाईदार किसानों के नाम पर जाली स्टाम्प पत्रों और कूटरचित नोटरी दस्तावेजों का इस्तेमाल कर करीब आठ पॉलिसियां जारी करा ली गईं। योजनाबद्ध तरीके से चलाए जा रहे इस खेल में ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की ऑडिट रिपोर्ट के बाद हड़कंप मचा, जिसके बाद कृषि आयुक्त नरेश कुमार गोयल ने मामले को गंभीर मानते हुए संयुक्त निदेशक (कृषि) बीकानेर को तीन दिवस के भीतर एफआईआर दर्ज कराने के कड़े लिखित निर्देश जारी किए। इस आदेश के अनुपालन में सहायक निदेशक कृषि (विस्तार) मीनाक्षी शर्मा ने गजनेर पुलिस थाने में विस्तृत साक्ष्यों के साथ परिवाद सौंपा, लेकिन पुलिस द्वारा अब तक मामला दर्ज न किए जाने से जांच प्रक्रिया ठप पड़ी है। भास्कर के पास इससे संबंधित दस्तावेज हैं। पूनरासर में 25 पॉलिसियां फर्जी मिलीं, कृषि विभाग ने दस्तावेज दबाए फसल बीमा योजना में फर्जीवाड़े का पहला बड़ा मामला जसरासर तहसील के मेनसर, बगसेऊ, गजसुखदेसर और मूंडसर जैसे गांवों का है, जहां हल्का पटवारी, कृषि कर्मियों और ई-मित्रों की मिलीभगत से 100 से अधिक असली किसानों की जमीनों पर फर्जी बंटाईदार खड़े कर दिए गए और रबी व खरीफ का करोड़ों रुपये का क्लेम उठा लिया गया। इस मामले की जांच एएसपी ग्रामीण कर रहे हैं। वहीं दूसरा मामला श्रीडूंगरगढ़ तहसील के पूनरासर गांव का है, जहां खरीफ 2025 के दौरान किसानों की जमाबंदी और खसरा नंबरों का गलत इस्तेमाल कर बिना उनकी जानकारी के 1 करोड़ से अधिक के क्लेम फर्जी खातों में ट्रांसफर करा लिए गए। पुलिस की जांच में करीब 25-26 फर्जी पॉलिसियां उजागर हुई हैं, लेकिन कृषि विभाग और इंश्योरेंस कंपनी ने पुलिस को अब तक दस्तावेज नहीं सौंपे हैं। "फर्जी फसल बीमा क्लेम के मामले की एफआईआर गजनेर पुलिस ने दर्ज नहीं की। हमने एसपी से आग्रह किया है।" — मदनलाल, संयुक्त निदेशक, कृषि (विस्तार) "कृषि बीमा के फर्जी क्लेम का मामला गजनेर हलके का नहीं है। विभाग के अधिकारी को संबंधित थाने में केस दर्ज कराना होगा।" — ओमप्रकाश सुथार, एसएचओ, गजनेर "फर्जी तरीके से फसल बीमा का क्लेम प्रस्तुत करने के मामले की जांच में करीब 25 आवेदन फर्जी मिले हैं। कृषि विभाग और इंश्योरेंस कंपनी से दस्तावेज मांगे थे, जो अब तक नहीं मिले।" — इमीचंद, एसएचओ, सेरुणा थाना पोर्टल की तकनीकी कमियों को लेकर बीकानेर से लेकर हनुमानगढ़ तक विसंगतियां फसल बीमा योजना के इस नेटवर्क का दायरा केवल एक इलाके तक सीमित नहीं है, हनुमानगढ़ जिले के परलीका व रामगढ़ क्षेत्र में भी इसकी गंभीर तकनीकी विसंगतियां सामने आई हैं। बीमा कंपनी और पंजाब नेशनल बैंक के ई-मेल पत्राचार से खुलासा हुआ है कि राज स्टेट लैंड पोर्टल से भू-अभिलेख डेटा का सही मिलान न होने के कारण सैकड़ों आवेदन खारिज या अटके हुए हैं। ग्राम 15 एनटीआर के खाता संख्या 1363008800037324 में भू-अभिलेख में दर्ज वास्तविक बुवाई क्षेत्र और बैंक द्वारा दर्ज क्षेत्रफल में अंतर आने से बीमा पोर्टल त्रुटि दर्शा रहा है। वहीं ग्राम 7 बरवाली के खाता संख्या 1363008800038651 में बीमित राशि मात्र 583.93 बनने के कारण न्यूनतम 1,000 की शर्त पूरी न होने से आवेदन खारिज कर दिया गया। ये तमाम मामले बताते हैं कि एक तरफ जहां वास्तविक किसान तकनीकी खामियों के कारण दर-दर भटक रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ संगठित गिरोह जाली दस्तावेजों के दम पर आसानी से पॉलिसियां बनवाकर सिस्टम को चूना लगा रहे हैं। कैसे हुआ फर्जीवाड़ा: एक स्टाम्प पर मल्टीपल पॉलिसियों में सीएससी सेंटरों की साठगांठ जांच में सामने आई फर्जीवाड़े की प्रणाली बेहद चौंकाने वाली है। जालसाजों ने 100 मूल्य के एक ही नॉन-ज्यूडिशियल स्टाम्प पत्र का बार-बार इस्तेमाल कर फर्जी बंटाईदार अनुबंध पत्र तैयार किए। उदाहरण के तौर पर स्टाम्प नंबर BY011656 पर कुल 4 अलग-अलग पॉलिसियां जारी करा ली गईं, जिनमें अलग-अलग किसानों की आईडी का प्रयोग कर हर बार भूस्वामी का नाम और जमीन का विवरण बदल दिया गया। ठीक इसी तरह स्टाम्प नंबर CD017256 का इस्तेमाल कर अन्य 4 फर्जी पॉलिसियां बनाई गईं। इन जाली अनुबंधों पर साइक्लोस्टाइल फॉर्मेट में विवरण भरकर उन पर नोटरी की मुहरें लगाई गईं, ताकि मूंगफली, ग्वार और कपास जैसी फसलों के करोड़ों रुपए के बीमा क्लेम का गबन किया जा सके। ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी की जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि ये सभी संदिग्ध पॉलिसियां सीएससी आईडी 326251230013 और 465426660016 के माध्यम से पीएमएफबीवाई के आधिकारिक पोर्टल पर अपलोड की गई थीं, जिससे कॉमन सर्विस सेंटरों और ई-मित्र संचालकों की सीधी भूमिका उजागर होती है।