पंचायत चुनावों में नेता गांवों को शहर की तरह सुविधायुक्त बनाने का दावा करते हैं। लेकिन पंचायतीराज की शुरुआत के 74 साल बाद आज भी प्रदेश के कई गांव पीने के पानी तक के लिए संघर्ष कर रहे हैं। भास्कर के गांव-गांव में किए ऑडिट में सामने आया है कि कुछ गांव ऐसे भी हैं, जहां 12-12 दिन के बाद आधे घंटे पानी की सप्लाई आती है। इतना ही नहीं बांसवाड़ा के कुंडल (मालवाड़ा और डाबीपाड़ा) में तो महिलाएं-बच्चे धूप में सूखी पड़ी कुंडल नदी के तल में गड्ढे खोद रिसते पानी को चुल्लू या गिलास से बर्तनों में भरते हैं। इस संकट के कारण स्थिति यह है कि इन गांवों में कोई अपनी बेटी ब्याहने को तैयार नहीं है। आज पंचायतों की सबसे बड़ी ऑडिट में पढ़िए पीने के पानी के लिए कैसे संघर्ष कर रहे हैं गांव... तलहटी में उतर पानी जुटाते हैं, पहाड़ी चढ़ते हैं, तब बुझती है प्यास बांसवाड़ा के मालवाड़ा-डाबीपाड़ा गांवों के बच्चे-महिलाएं सूखी नदी की तलहटी खोदकर पानी जुटाते हैं। पानी भरकर 1 किमी पहाड़ी चढ़ते हैं। गर्मी के महीनों में इनका आधा दिन तो पानी जुटाने में बीतता है। इसी जिले के रामगढ़ के ग्रामीण गर्मी में मवेशियों को लेकर गुजरात व एमपी के पानी वाले इलाकों में चले जाते हैं। जिसने 30 लाख की जमीन दान दी, उसे ही कनेक्शन नहीं ​ गंगानगर जिले के ​4 केपीडी के किसान बनवारीलाल मेघवाल ने जलघर के लिए 30 लाख रु. की 4 बीघा जमीन दान दी थी। जलघर तो बना, लेकिन फिल्टर प्लांट चालू नहीं हुआ। ग्रामीणों को नहर की डिग्गी से बिना फिल्टर पानी ही सप्लाई हो रहा है। दानदाता की ढाणी जलघर से महज 350 फीट दूर थी, फिर भी उन्हें 12 साल तक कनेक्शन नहीं मिल सका। आखिरकार छह महीने पहले किसान को खुद के खर्च पर पाइपलाइन डलवानी पड़ी। इधर, नागौर जिले के मूंडवा उपखंड की संखवास ग्राम पंचायत के मोड़ी गांव में 10 से 12 दिन बाद महज 20-25 मिनट जलापूर्ति होती है। लालाप में अवैध कनेक्शन इतने हैं कि लोग बूंद-बूंद को तरस रहे हैं। तालाब का गंदा पानी पीने को मजबूर हैं। चाऊ, रातंगा, भूंडेल में भी इसी तरह की समस्याएं हैं।