गुस्सा हद पार, कई केस में जानें गईं मानसिक बीमारी के लक्षणों को समय पर पहचानना और नियमित उपचार लेना जरूरी है। लक्षणों की अनदेखी और इलाज में देरी से स्थिति बिगड़ सकती है। बड़ौदामेव में युवक की हत्या, दांतली में मां का बच्चों पर हमला और अलवर शहर में युवक की आत्महत्या जैसी घटनाओं ने मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और समय पर मदद की जरूरत को सामने रखा है। हालांकि, मानसिक बीमारी का मतलब हिंसा या अपराध नहीं है। हर मामले के कारण अलग होते हैं और किसी घटना को केवल मानसिक बीमारी से जोड़ना उचित नहीं है। जिला अस्पताल की मानसिक रोग ओपीडी में इस साल अब तक 36,709 मरीज पहुंचे हैं, जबकि पिछले पूरे साल यह संख्या 35,482 थी। पारिवारिक समस्याओं का समाधान बातचीत, आपसी समझ और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद से किया जाए। मानसिक परेशानी से गुजर रहे व्यक्ति को अकेला छोड़ने के बजाय उसका साथ देना और समय पर सहायता उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण है। केस-1 : बड़ौदामेव में पत्थर मारकर हत्या करने वाला मानसिक कमजोर था बड़ौदामेव में 24 सितंबर को सेकून खान (40) की पत्थर से सिर पर हमला कर हत्या कर दी गई थी। बड़ा वास निवासी सेकून बाइक का टायर खरीदने बाजार आया था। वह अपने गांव के नूर मोहम्मद को बैंक में छोड़कर थाने के सामने से गुजर रहा था, तभी हर्ष नाम के युवक ने उसे बाइक से नीचे गिराकर सड़क पर पड़े पत्थर से सिर पर हमला कर दिया। पुलिस ने आरोपी को पकड़ लिया। प्रारंभिक जांच में उसके मानसिक रूप से कमजोर होने की बात सामने आई थी। केस-2 : दांतली में दो बच्चों और खुद की जान ली, मां मानसिक बीमार थी खेड़ली के पास दांतली गांव में एक महिला ने कैंची से अपने दो बच्चों के गले पर हमला किया और बाद में खुद को भी घायल कर लिया था। जानकारी के अनुसार, महिला लंबे समय से मानसिक बीमारी से जूझ रही थी और उसका इलाज चल रहा था। परिवार ने झाड़-फूंक का भी सहारा लिया था। उसके व्यवहार में गुस्सा और बच्चों के साथ मारपीट जैसी समस्याएं सामने आई थीं। यह घटना लक्षणों को गंभीरता से लेने और नियमित उपचार जारी रखने की जरूरत बताती है। केस-3 : पत्नी से विवाद के बाद युवक ने की आत्महत्या, मन से हार गया अलवर शहर में रविवार देर रात पत्नी से विवाद के बाद 30 वर्षीय लोकेश ने फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली। केमाला गांव निवासी लोकेश 60 फीट रोड क्षेत्र में नाई का काम करता था। घटना के समय परिवार के अन्य सदस्य बाहर गए हुए थे और वह घर में अकेला था। कुछ देर बाद परिजनों ने उसे फंदे पर लटका देखा। उसकी मौत से परिवार में शोक छा गया। उसके तीन बच्चों के सिर से पिता का साया उठ गया। मामले में डिप्रेशन जैसी स्थिति वजह बन गई। बीमारी का मतलब अपराधी होना नहीं, अवसाद में अपराध मानसिक बीमारी और अपराध के बीच अंतर समझना जरूरी है। मानसिक बीमारी से जूझ रहे हर व्यक्ति के अपराध करने की आशंका नहीं होती। अवसाद और चिंता में व्यक्ति अपनी परेशानियों से घिरा रह सकता है, जबकि कुछ गंभीर मानसिक विकारों में वास्तविकता को समझने, भावनाओं पर नियंत्रण रखने और निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। तनाव या अवसाद की स्थिति में खुद को नुकसान पहुंचाने का जोखिम भी बढ़ सकता है, लेकिन इसे हर मानसिक रोगी के व्यवहार से जोड़ना गलत है। वैवाहिक संबंधों में तनाव, प्रेम संबंधों की परेशानियां, पारिवारिक समस्याएं और आर्थिक दबाव व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाल सकते हैं। कुछ मामलों में आनुवंशिक कारण भी भूमिका निभा सकते हैं। ऐसे समय में व्यक्ति को परिवार के सहयोग, काउंसलिंग और मनोचिकित्सकीय उपचार की जरूरत होती है। मानसिक बीमारी का समय पर उपचार, परिवार का सहयोग, सामाजिक संवेदनशीलता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर ही मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कलंक को कम किया जा सकता है। लंबे समय तक उदासी, अत्यधिक चिंता, भ्रम, व्यवहार में अचानक बदलाव या खुद को नुकसान पहुंचाने की बातों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे लक्षण दिखने पर विशेषज्ञ से संपर्क करना जरूरी है। मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने और जरूरतमंद लोगों तक समय पर मदद पहुंचाने से जोखिम कम करने में सहायता मिल सकती है। -प्रो. सुशीला पारीक, सेवानिवृत्त पूर्व विभागाध्यक्ष, मनोविज्ञान विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय