चूरू सहित शेखावाटी की विशिष्ट भित्तिचित्र कला को भारत की राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल करने की तैयारी है। भारत सरकार के संगीत नाटक अकादमी व संस्कृति मंत्रालय ने इसकी तैयारियां शुरू कर दी हैं। कला परंपरा को सूची में 65वें क्रमांक पर स्थान दिया गया है। इसे क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, दस्तावेजीकरण व राष्ट्रीय पहचान की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। राष्ट्रीय पहचान मिलने से अंचल में पर्यटन को अभूतपूर्व बढ़ावा मिलेगा। राजस्थान कला, संस्कृति एवं विरासत संरक्षण अभियान समिति की ओर से शेखावाटी की हवेलियों में उकेरे गए भित्तिचित्रों को राष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए प्रयास किए जा रहे थे। संस्था ने संबंधित विभागों को लगातार पत्राचार किया और शोध सामग्री उपलब्ध कराई। इसके बाद संस्कृति मंत्रालय ने सूची में शामिल करने की प्रक्रिया शुरू की। {जिला मुख्यालय पर 1870 में बनी सुराणा हवेली को चूरू का हवामहल कहा जाता है। इसमें 1133 खिड़की-दरवाजे हैं। यह हवेली फिल्मों की शूटिंग के लिए भी जानी जाती है। सुजानगढ़ में साहित्यकार कन्हैयालाल सेठिया की 135 वर्ष पुरानी हवेली स्थापत्य कला का अनुपम उदाहरण है। वहीं रतनगढ़ में पोद्दार परिवार द्वारा निर्मित गजकेशरी हवेली स्थापत्य कला व भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्ध है। जिले में 400+ हवेलियां ऐसी हैं, जिनका सौंदर्यीकरण करवाकर पर्यटन के रूप में उपयोग किया जा सकता है। हालांकि अधिकतर के मालिक बाहर रहते हैं। जिला प्रशासन ने भित्ति चित्रों से सजी व स्थापत्य कला के रूप में विशिष्ट पहचान रखने वाली जिले की 112 हवेलियों को सूची तैयार करवाई है। इनमें सर्वाधिक सरदारशहर की 35, सुजानगढ़ की 24, छापर की 15, चूरू की 12, तारानगर की 9 व रतनगढ़ की 7 हवेलियां हैं। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए चूरू की सुराणा हवेली, कोठारी हवेली, पारख हवेली, बांठिया हवेली, बोथरा हवेली, रावतमल हवेली, नगरश्री व कोठारी हवेली पर क्यूआर कोड लगाए है, जिन्हें स्कैन कर अंदर के भित्तिचित्र देखे जा सकते हैं। शेखावाटी की सांस्कृतिक परंपरा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलेगी। यह कला व विरासत प्रेमियों, शोधकर्ताओं, स्थानीय समुदायों व वर्षों से इस धरोहर को बचाने में जुटे लोगों के सामूहिक प्रयासों का परिणाम है। इससे स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर भी मिलेंगे। -नितिन बजाज, संयोजक, राजस्थान कला, संस्कृति व विरासत संरक्षण अभियान समिति