राष्ट्रीय पशुधन मिशन (एनएलएम) के तहत सब्सिडी उठाकर बकरी फार्म की जगह ईंटों के भट्टे और लोहे की चद्दर बनाने के कारखाने चलाने के मामले में विभाग ने एक्शन शुरू कर दिया है। 5 अक्टूबर को भास्कर के खुलासे के बाद, पशुचिकित्सा विभाग के उदयपुर जोन ने चित्तौड़गढ़ के तीनों फार्मों की भौतिक जांच की। जांच में तथ्य सही पाए गए। मौके पर कोई बकरी फार्म नहीं मिला और यह साफ हो गया कि केवल सब्सिडी डकारने के लिए इन्हें कागजों में चलाया जा रहा था और पैसा मिलते ही इन्हें बंद कर दिया। उदयपुर जोन ने अपनी तथ्यात्मक जांच रिपोर्ट जयपुर निदेशालय को भेज दी है। इसके आधार पर निदेशालय ने चित्तौड़गढ़ के भूर्तिया खुर्द की लाभार्थी जेबू निशा, और गंगरार के कायम खान मंसूरी व मुक्तयार आलम को नोटिस जारी कर दिए हैं। विभाग अब इन तीनों से दी गई सब्सिडी की पूरी राशि 10 प्रतिशत ब्याज के साथ वसूलेगा। इसके साथ ही इन तीनों के खिलाफ धोखाधड़ी की एफआईआर भी दर्ज कराई जाएगी। फर्जीवाड़े के सामने आने के बाद पशुपालन विभाग के निदेशक डॉ. सुरेशचंद मीणा ने स्पष्ट किया है कि अब पूरे प्रदेशभर में चल रहे सभी फार्मों की सघन जांच करवाई जाएगी। इन फार्मों की जमीनी हकीकत परखने के लिए नोडल अधिकारी लगाए जाएंगे, ताकि वे लगातार इनकी मॉनिटरिंग कर सकें और ऐसा फर्जीवाड़ा दोबारा न हो। अधिकारियों को बचाने का खेल: एनएलएम सब्सिडी में सबसे ज्यादा फर्जीवाड़ा चित्तौड़गढ़ जिले में ही हुआ है। यहां करीब 14 लोगों को इस सब्सिडी का फायदा मिला है, लेकिन इनमें से अधिकतर फार्म बंद हैं। यह खेल बिना विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत के संभव नहीं है। चित्तौड़गढ़ में संयुक्त निदेशक डॉ. सुमेर सिंह लंबे समय से पदस्थापित हैं। इन बंद पड़े फार्मों को कागजों में चालू बताने और इनके निरीक्षण का काम उन्होंने ही किया था। हैरानी की बात यह है कि निदेशालय ने जांच रिपोर्ट मिलने के बाद फार्म मालिकों पर तो एफआईआर और वसूली निकाल दी, लेकिन निरीक्षण रिपोर्ट बनाकर सरकारी पैसे का गबन करवाने वाले अधिकारियों पर अब तक कोई जिम्मेदारी तय नहीं की गई है।