चुनाव ड्यूटी, जनगणना, बीएलओ कार्य, पोषाहार का हिसाब और शाला दर्पण पर कागजी खानापूर्ति... गैर-शैक्षणिक कामों के बोझ तले दबे सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को अब एक नया जिम्मा सौंप दिया गया है। शिक्षा विभाग के नए फरमान के तहत अब कक्षा 1 से 12 तक के बच्चों की आंखों की जांच का जिम्मा डॉक्टरों का नहीं, बल्कि क्लास टीचर का होगा। उदयपुर जिले के लगभग 3.56 लाख विद्यार्थियों की आंखों की प्राथमिक जांच अब 2,920 स्कूलों के शिक्षकों को ही करनी होगी। विभाग के आदेशानुसार स्कूलों में 10 मीटर की दूरी पर स्नेलन चार्ट लटकाया जाएगा और मास्टरजी बच्चों से अक्षर पढ़वाएंगे। जिस बच्चे की दृष्टि कमजोर लगेगी, उसका ब्योरा शाला दर्पण पोर्टल पर ऑनलाइन दर्ज किया जाएगा। शिक्षकों के बीच इस नए आदेश को लेकर भारी असमंजस है। सवाल: बिना ट्रेनिंग शिक्षक कैसे तय करेंगे कि किस बच्चे को लगेगा चश्मा? अब सवाल यह है कि बिना किसी मेडिकल ट्रेनिंग के शिक्षक यह कैसे तय करेंगे कि बच्चे को किस नंबर के चश्मे की जरूरत है? यदि अनजाने में किसी 6/6 विजन वाले बच्चे की गलत रिपोर्ट दर्ज हो गई तो जिम्मेदारी किसकी होगी? बता दें, इससे पहले व्यवस्था यह थी कि स्वास्थ्य विभाग की मेडिकल टीम हर तीन महीने में स्कूलों में जाकर बच्चों के आंखों के विजन, वजन और सामान्य स्वास्थ्य की जांच करती थी। इससे बच्चों की अन्य शारीरिक बीमारियां भी पकड़ में आ जाती थीं। प्राथमिक जांच शिक्षक ही करेंगे। इसमें कोई बच्चा कमजोर दृष्टि का पाया जाता है तो शिक्षक उसका डेटा शाला दर्पण पोर्टल पर अपलोड करेंगे। इसके बाद चिकित्सा विभाग के साथ तालमेल बनाकर बच्चे के इलाज और मुफ्त चश्मे की व्यवस्था कराई जाएगी। -कुंजबिहारी भारद्वाज, अतिरिक्त जिला परियोजना समन्वयक, समग्र शिक्षा अभियान