राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रोबेशन (परिवीक्षा) पर अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि दोषी ठहराए जाने के बाद जेल भेजना स्वाभाविक नतीजा नहीं। अदालत को अपराध की प्रकृति, आरोपी की परिस्थितियों, चरित्र और सुधार की संभावना पर ध्यान देना चाहिए। प्रोबेशन की मांग बिना खास वजह के खारिज करना ठीक नहीं। जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने 'रामस्वरूप बनाम राजस्थान राज्य' मामले में यह टिप्पणी की। अपीलार्थी की ओर से प्रियंका बोराणा और राज्य की ओर से नरेंद्र गहलोत ने वकालत की। ट्रायल कोर्ट ने अपीलार्थी को आर्म्स एक्ट की धारा 3/25 के तहत दोषी ठहराया था। दोषी ठहराए जाने का फैसला बरकरार रखा हाईकोर्ट ने दोषी ठहराए जाने का फैसला बरकरार रखा। कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने प्रोबेशन खारिज करते समय कोई खास वजह नहीं बताई। यह अपीलार्थी की पहली दोषसिद्धि थी, कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था। कोर्ट ने कहा कि प्रोबेशन के प्रावधान न्याय व्यवस्था में सुधार दिखाते हैं। अपराधी को सुधार का मौका देना भी न्याय के मकसद को पूरा कर सकता है। धारा 360 और 361 सीआरपीसी के तहत प्रोबेशन नहीं देने पर खास वजह बताना जरूरी है। तुरंत रिहा किया जाए अपीलार्थी अपनी पूरी सजा और जुर्माना भुगत चुका था। कोर्ट ने अपील आंशिक रूप से मंजूर करते हुए निर्देश दिया कि अगर वह किसी और मामले में वांछित नहीं है तो उसे तुरंत रिहा किया जाए।