बचपन जिंदगी का वह दौर है, जिसमें खुशियों के लिए किसी बड़े कारण की जरूरत नहीं होती। कभी खिलखिलाती हंसी, कभी खेल में डूबी आंखें, कभी किसी नई चीज को जानने की जिज्ञासा तो कभी बिना किसी चिंता के अपने ही संसार में खो जाना शामिल है।। बचपन की इसी सहज दुनिया को वरिष्ठ छायाकार शैलेंद्र गोसाईं ने अपनी तस्वीरों में दिखाया है। जवाहर कला केंद्र की ‘सुरेख’ आर्ट गैलरी में उनकी एकल छायाचित्र प्रदर्शनी ‘शैशव’ का आयोजन किया गया है। 27 वर्षों से फोटोग्राफी के क्षेत्र में सक्रिय शैलेंद्र गोसाईं ने इस प्रदर्शनी में अपने लंबे अनुभव और कलात्मक दृष्टि के जरिए बचपन के अलग-अलग भावों को कैमरे में कैद किया है। 23 सितंबर तक चलने वाली यह प्रदर्शनी प्रतिदिन सुबह 11 बजे से शाम 7 बजे तक दर्शकों के लिए खुली है। गुजरात राज्य ललित कला अकादमी की ओर से इस एग्जीबिशन का आयोजन किया जा रहा है। यहां देखिए एग्जीबिशन की फोटोज… तस्वीरों में नजर आती है बेफिक्र दुनिया ‘शैशव’ की तस्वीरों की खासियत यह है कि इनमें बचपन को केवल बच्चों के चेहरे के रूप में नहीं, बल्कि उनके पूरे भाव-जगत के रूप में देखने की कोशिश की गई है। किसी तस्वीर में बच्चे की आंखों की चमक आकर्षित करती है तो किसी में चेहरे पर आई सहज मुस्कान। कहीं खेलते हुए बच्चे अपने आसपास की दुनिया से बेखबर नजर आते हैं तो कहीं उनकी निगाहें किसी नई चीज को उत्सुकता से तलाशती दिखाई देती हैं। इन तस्वीरों में बच्चों की बेबाक हंसी, खेल-कूद, शरारत, जिज्ञासा और नन्हे सपनों को सहज अंदाज में दर्ज किया गया है। तस्वीरें यह अहसास कराती हैं कि बचपन में छोटी-छोटी चीजें भी कितनी बड़ी खुशी बन जाती हैं। कैमरे ने उन क्षणों को पकड़ा है, जो सामान्य नजर से गुजर जाते हैं, लेकिन तस्वीर में आने के बाद लंबे समय तक मन में ठहर जाते हैं। आंखों की चमक में छिपी कहानी प्रदर्शनी में बच्चों की आंखें भी तस्वीरों का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। कई फ्रेम में चेहरे से ज्यादा आंखें अपनी कहानी कहती महसूस होती हैं। कहीं मासूम सवाल है, कहीं आश्चर्य, कहीं शरारत और कहीं ऐसा आत्मविश्वास, जो बचपन की सहज दुनिया को सामने लाता है। शैलेंद्र गोसाईं की फोटोग्राफी में इन भावों को किसी बनावटी मुद्रा के बजाय स्वाभाविक क्षणों के जरिए सामने लाने का प्रयास दिखाई देता है। बच्चे जिस तरह अपने आसपास की दुनिया को देखते हैं, उसी नजर से उन पलों को कैमरे में सहेजने की कोशिश ‘शैशव’ को भावनात्मक आयाम देती है। खेल में सिमटी बच्चों की पूरी दुनिया बचपन की दुनिया में खेल सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सीखने और कल्पना करने का माध्यम भी होता है। प्रदर्शनी की तस्वीरों में बच्चों के खेलते हुए पल इसी भावना को सामने लाते हैं। कोई खेल में पूरी तरह डूबा है, कोई साथी के साथ अपनी खुशी साझा कर रहा है तो कोई अपने ही खेल की दुनिया में मग्न दिखाई देता है। इन दृश्यों में बचपन की वह आजादी महसूस होती है, जहां समय की चिंता नहीं होती। खेल ही दुनिया है और उस पल की खुशी ही सबसे बड़ी खुशी। यही सहजता तस्वीरों को जीवंत बनाती है। ‘शैशव’ की सबसे खास बात यह है कि तस्वीरों में भले ही अलग-अलग बच्चों के चेहरे दिखाई देते हैं, लेकिन उनमें दर्शक अपने बचपन की यादें तलाश सकते हैं। किसी तस्वीर में उन्हें अपने पुराने खेल याद आ सकते हैं, किसी में दोस्तों के साथ बिताया समय और किसी में वह बेफिक्र मुस्कान, जो आज की व्यस्त जिंदगी में कहीं पीछे छूट गई है। यही वजह है कि यह प्रदर्शनी केवल बच्चों की तस्वीरों का संग्रह नहीं रह जाती, बल्कि दर्शक को अपने भीतर के बचपन तक ले जाने वाली दृश्य यात्रा बन जाती है। ‘फोटोग्राफी मेरे लिए वक्त को सहेजना है’ शैलेंद्र गोसाईं ने बताया कि उनके लिए फोटोग्राफी महज तस्वीर खींचने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि समय के किसी अनमोल पल को हमेशा के लिए सहेज लेने का माध्यम है। उनका मानना है कि तस्वीरों में नजर आने वाले चेहरे भले ही दर्शकों के लिए अनजान हों, लेकिन उनमें से कई तस्वीरें उन्हें अपने बचपन की कोई न कोई झलक जरूर दिखा सकती हैं।