भास्कर न्यूज |भरतपुर भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं, लोकआस्था और कलात्मक अभिव्यक्ति का प्रतीक सांझी परंपरा का पितृपक्ष में परंपरा से जुडे़ लोगों ने मनाया। इसका विसर्जन शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या पर पूजा-अर्चना के बाद नदी या तालाब में विसर्जन किया गया। कन्याओं ने घरों की दीवारों पर गोबर से सूर्य, चंद्रमा, देवी-देवताओं और कृष्णलीलाओं की आकृतियां उकेरा हैं, तो कहीं पुष्टिमार्गीय मंदिरों में ठाकुरजी के समक्ष फूलों, रंगों और विभिन्न सामग्रियों से सांझी के मनोरथ सजाए गए । स्वरूप और माध्यम अलग हैं, लेकिन दोनों परंपराओं के केंद्र में श्रीकृष्ण की भक्ति और ब्रज की सांस्कृतिक विरासत है। सांझी की लोक परंपरा आज भी कुछ परिवारों में जीवित है। मंजू, पूजा, दिशा, राखी, प्रियंका और परी आदि सर्वपितृ अमावस्या से दो दिन पहले बड़ी सांझी तैयार करती हैं। गोबर से बनाई गई आकृतियों को मिट्टी से बनी बताशे नुमा सजावटी आकृतियों से संवारा जाता है। इनके साथ पारंपरिक लोकगीत गाए जाते हैं। अमावस्या की सुबह पूजा-अर्चना के बाद सांझी का नदी या तालाब में विसर्जन किया जाता है। यह कन्याओं का लोक उत्सव है। जिसमें परिवार की महिलाएं भी शामिल होती हैं। लोककथा के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण शाम को गायों के साथ लौटते थे, तब गोपियां उन्हें रिझाने के लिए घरों के सामने सुंदर आकृतियां बनाती थीं। अगली सुबह उन्हें मिटाकर शाम को फिर नई आकृतियां सजाई जाती थीं। इसी परंपरा को सांझी से जोड़कर देखा जाता है। सामाजिक विषयों की जानकार राखी फौजदार बताती हैं कि पहले घर-घर की दीवारों पर सांझी सजती थी, लेकिन अब नई पीढ़ी की घटती रुचि के कारण यह कला कुछ परिवारों तक सिमट गई है। ब्रज के पुष्टिमार्गीय मंदिरों में भी सांझी का विशेष धार्मिक और कलात्मक महत्व है। यहां परंपरा के अनुसार ठाकुरजी के समक्ष फूलों, रंगों और अन्य सामग्रियों से सांझी के मनोरथ रचे जाते हैं। इनमें कृष्णलीला और ब्रज की भाव भूमि को कलात्मक रूप दिया जाता है। मंदिरों की सांझी जहां सेवा, श्रृंगार और भक्ति का स्वरूप है। लोकगीतों, सामूहिक सहभागिता और पारंपरिक कला का जीवंत दस्तावेज है। इसे सहेजने के लिए सांझी बनाने की कार्यशालाएं, स्कूलों में लोककला परिचय और मंदिरों व सांस्कृतिक संस्थाओं के सहयोग से प्रदर्शनियां आयोजित किए जाने की ज़रुरत है। ताकि दीवारों से सिमटती यह कला अगली पीढ़ी तक पहुंच सके।