थार के रेगिस्तान में इस बार अकाल जैसे भीषण हालात बने हुए हैं। गांवों में न पानी है। न चारे की व्यवस्था। ऐसी स्थिति में इंसान तो क्या, पशुधन भी बेहाल है। गांवों में चारे-पानी के अभाव में पशुओं को मौत के मुहाने पर लाकर छोड़ दिया गया है। यह कहानी बाड़मेर जिले के बॉर्डर इलाके खबडाला, सरगुवाला, रोहिड़ी की है। यहां इस बार बेहद कम बारिश हुई है। गडरारोड इलाके में इस बार महज 185 एमएम और रामसर में महज 111 एमएम बारिश हुई है, जबकि औसत 350 एमएम बारिश जरूरी थी। ऐसे में औसत से 70 फीसदी कम बारिश हुई है। इससे गांवों में भीषण अकाल के कारण चारे-पानी को लेकर हाहाकार मचा हुआ है। खबडाला: मीठा पानी सपना बना : ग्राम पंचायत खबडाला में अकाल से जूझ रहे पशुओं के सामने चारे-पानी का संकट है। करीब 500 घरों की आबादी वाले इस गांव में नर्मदा का पानी टैंक तक तो पहुंचा है, लेकिन लोगों के घरों तक नहीं पहुंचा। इससे लोग बेरियों के पानी पर ही निर्भर हैं। सरगुवाला: अब तालाब ही पशुओं का बसेरा: धोरे पर बसा सरगुवाला गांव पहली बार पंचायत बना है। यहां के लोगों के लिए पशुधन ही कमाई का एकमात्र जरिया है। ऐसे में हर घर में 100-150 भेड़-बकरियां, 5-7 गोवंश हैं। अब अकाल में मरते गोवंश को जिंदा रखने के लिए उन्हें तालाबों पर छोड़कर आ रहे हैं। खारड़ी: तालाब पर 2 हजार गायें व 10 हजार भेड़ बकरियां : खारड़ी गांव में करीब 100 साल पुराना 500 मीटर से ज्यादा के एरिया में फैला हुआ है। यहां इस तालाब में पानी अभी भी है। ऐसे में आसपास के करीब 15-20 किमी. के द्राभा, सुंदरा, ढगारी सहित 20 से ज्यादा गांवों के लोग पशुओं को छोड़कर जाते हैं। आजीविका का मुख्य सहारा पशुधन, अकाल से आहत खबडाला गांव में करीब 2000 गायें हैं। 20 हजार से ज्यादा भेड़-बकरियां हैं। अकाल ने हमारी रोज-रोटी छीन ली है। पशुधन के अलावा हमारी आजीविका कुछ नहीं है। हम पशुओं पर निर्भर हैं। -दलपतसिंह, किसान खबडाला। खारड़ी तालाब 100 साल पुराना है। इसमें सालभर पानी रहता है। अब भी पानी भरा हुआ है। सरगुवाला में पशुओं को बचाने के लिए किसान खारड़ी तालाब पर छोड़कर आ रहे हैं। -नींबसिंह, किसान सरगुवाला।