करीब एक दशक से बंद गिरल लिग्नाइट थर्मल पावर प्लांट की खाली जमीन अब बिजली बनाने के बजाय उसे ‘स्टोर’ करने के काम आएगी। प्लांट की भविष्य की यूनिट 3-4 के लिए आरक्षित करीब 50 हजार वर्गमीटर जमीन पर कुल 300 मेगावाट क्षमता के तीन बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) लगाए जा रहे हैं। इनमें 125-125 मेगावाट के दो और 50 मेगावाट का एक प्रोजेक्ट होगा। ये स्टैंडअलोन बैटरी सिस्टम दिन में ग्रिड पर उपलब्ध कम लागत की सोलर-विंड बिजली से चार्ज होंगे और शाम 6 से रात 10 बजे की पीक डिमांड के दौरान जरूरत के अनुसार डिस्चार्ज किए जाएंगे। इससे डिस्कॉम को महंगी पीक पावर खरीदने पर निर्भरता घटाने और बिजली सप्लाई को स्थिर रखने में मदद मिलेगी। जेएसडब्ल्यू रिन्यू एनर्जी थर्टी सेवन लिमिटेड का 125 मेगावाट प्रोजेक्ट दिसंबर तक चालू करने का लक्ष्य है। इसके सिविल वर्क, फाउंडेशन और पावर ट्रांसफार्मर का काम चल रहा है। दूसरा 125 मेगावाट/250 मेगावाट-आवर प्रोजेक्ट ट्रूएरे नाइट प्राइवेट लिमिटेड का है। तीसरा 50 मेगावाट का प्रोजेक्ट मार्च-अप्रैल तक पूरा करने की तैयारी है। 125 MW/250 MWh क्षमता वाली बैटरी फुल आउटपुट पर लगातार दो घंटे बिजली दे सकती है। पुराने प्लांट का इंफ्रास्ट्रक्चर अब बनेगा ताकत गिरल में पहले से मौजूद 220 केवी स्विचयार्ड और ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर का नए प्रोजेक्ट में उपयोग होगा। यहां 160 एमवीए पावर ट्रांसफार्मर भी प्रस्तावित है। बीईएसएस से निकली बिजली दो 220 केवी लाइनों के जरिए प्लांट के स्विचयार्ड में पहुंचेगी। इससे नए सिरे से पूरा ग्रिड नेटवर्क खड़ा करने की जरूरत कम होगी। राज्य सरकार ने जमीन निजी कंपनियों को निर्धारित किराए पर दी है। ट्रांसमिशन और ग्रिड उपयोग के शुल्क प्रसारण निगम के प्रावधानों के अनुसार रहेंगे। स्टोरेज सिस्टम से उपलब्ध बिजली निर्धारित अनुबंध और स्टोरेज चार्ज के आधार पर डिस्कॉम को मिलेगी। एसई एमएंडपी कैलाश कुमार के अनुसार तीनों BESS के लिए मीटरिंग प्रक्रिया चल रही है और फाइल एमएंडपी विंग में पहुंच चुकी है। गिरल के अतिरिक्त मुख्य अभियंता दिनेश राठी के मुताबिक पहला 125 MW प्लांट दिसंबर और शेष प्रोजेक्ट मार्च-अप्रैल तक चालू करने का लक्ष्य है।