मेवाड़ की पारंपरिक कला को आधुनिक अंदाज में दुनिया के सामने रखने की कोशिश अब अंतरर्राष्ट्रीय मंच तक पहुंच गई है। पिछले दिनों दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से जुड़े हस्तशिल्प बाजार में उदयपुर के ब्रांड रंगौरी ने अपने हस्तनिर्मित उत्पादों के जरिए मेवाड़ की कलात्मक विरासत की झलक पेश की। पारंपरिक शिल्प को आधुनिक जीवनशैली और डिजाइन से जोड़कर तैयार किए गए रंगौरी के उत्पादों को प्रदर्शनी में सराहना मिली। रंगौरी की शुरुआत करीब डेढ़ साल पहले उदयपुर की गौरी पालीवाल ने अपनी मां वंदना पालीवाल के सहयोग से की। सम्मेलन से उदयपुर लौटरी मां-बेटी ने बताया कि उनको बहुत खुशी हुई की मेवाड़ की कला को वहां बहुत पसंद किया गया। भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा ने गौरी पालीवाल के स्टॉल पर गए और उनके अनुभव जाने। मां-बेटी ने ऑनलाइन कोचिंग के साथ हस्तनिर्मित उत्पाद तैयार करने का काम शुरू किया। उनका उद्देश्य भारतीय हस्तशिल्प की मूल पहचान को बरकरार रखते हुए ऐसे उत्पाद तैयार करना है, जो नई पीढ़ी की पसंद और घरों की आधुनिक सजावट के अनुरूप हों। क्रोशिया से लेकर कुंदन तक का संगम रंगौरी के उत्सव संग्रह में पारंपरिक जरी-कढ़ाई, मोती और कुंदन को नए डिजाइन के साथ तैयार किया गया है। प्रदर्शनी में क्रोशिया से बने खिलौने, सजावटी फूल, बालों के सामान, घर सजाने की वस्तुएं, पारंपरिक बंदनवार, दीवार सजावट, तैयार रंगोलियां और मोतियों से बने आभूषण आकर्षण का केंद्र रहे। हर उत्पाद को तैयार करने से पहले उसके लिए थीम, रंग और डिजाइन का चयन किया जाता है। इसके बाद उत्पाद की मजबूती और उसकी बनावट की जांच की जाती है। गुणवत्ता सुनिश्चित होने के बाद ही उसे अंतिम रूप देकर तैयार किया जाता है। 18 देशों के कारीगरों ने लिया हिस्सा नई दिल्ली के नेशनल क्राफ्ट्स म्यूजियम एवं हस्तकला अकादमी में 10 से 15 सितंबर तक आयोजित हुई अंतरर्राष्ट्रीय हस्तशिल्प बाजार में 18 देशों के कारीगरों ने भाग लिया। यहां अलग-अलग देशों और भारतीय राज्यों की पारंपरिक कलाओं को एक मंच पर प्रदर्शित किया गया। प्रदर्शनी में बिहार के सत्तू और मखाना, ओडिशा की कोरापुट कॉफी, राजस्थान की लाख की चूड़ियां और टेराकोटा, कश्मीर की पेपर-माशे कला के साथ बेलारूस की चिल्लो वीविंग, ईरान की बलूची कढ़ाई, रूस की लास्य कला और दक्षिण अफ्रीका की बीडवर्क कला भी प्रदर्शित की गई। इस अंतरर्राष्ट्रीय आयोजन में उदयपुर के रंगौरी ने मेवाड़ की हस्तकला को आधुनिक रूप में पेश कर शहर की रचनात्मक पहचान को नई जगह दिलाई।