उदयपुर में इस बार मानसून कम मेहरबान रहा। जिले में पूरे सीजन औसत बारिश भी 27 प्रतिशत कम हुई। इसका सीधा असर यहां की झीलों और जलाशयों पर देखने को मिल रहा है। अभी से इसका असर दिखने लगा है। झीलों से उदयपुर में सप्लाई होने वाली जलापूर्ति को 72 घंटे से करने का विभाग को फैसला करना पड़ा, क्योंकि पानी की कमी के चलते अगली बारिश तक समय निकालना है। हर बार की तुलना में इस बार उदयपुर में कम बारिश हुई है। सितंबर के अंतिम सप्ताह में मानसून की विदाई का दौर शुरू हो चुका है और अधिकांश इलाकों में मौसम के शुष्क रहने का पूर्वानुमान रहा है। 29 सितंबर तक की बात करें तो उदयपुर में औसत 616 मिलीमीटर सामान्य बारिश होनी चाहिए थी लेकिन 451.3 मिलीमीटर ही अब तक बारिश हुई है जो करीब 27 प्रतिशत कम है। जिले के 9 प्रमुख जलाशयों की बात करते है तो इनमें कुल क्षमता 560.83 एमसीयूएम है, जिसमें 344.47 एमसीयूएम पानी बचा है। यानी करीब 61.4% जलभराव है और 216.36 एमसीयूएम क्षमता खाली है। अब उदयपुर की प्यास बुझाने वाले जलाशयों की स्थिति पिछोला झील स्वरूप सागर : इसकी क्षमता 13.68 एमसीयूएम है और इसमें 10.030 एमसीयूएम पानी है। यानी करीब 73.3 फीसदी भराव है और 3.650 एमसीयूएम खाली है। फतहसागर झील: 68.5 फीसदी पानी अभी है। इसकी कुल क्षमता 12.09 एमसीयूएम है और वर्तमान में 8.280 एमसीयूएम पानी है। मानसी वाकल : 56 फीसदी से ज्यादा जलभराव है। इसकी क्षमता 24.41 एमसीयूएम है। वर्तमान पानी 13.760 एमसीयूएम है। अभी 10.650 एमसीयूएम क्षमता खाली है। आकोदड़ा बांध : 8 फीसदी से भी कम पानी है। इसकी क्षमता 8.55 एमसीयूएम है, लेकिन पानी केवल 0.650 एमसीयूएम है। यानी सिर्फ 7.6 फीसदी क्षमता भरी है। जयसमंद : सलूंबर जिले में आने वाले जयसमंद की क्षमता 415.13 एमसीयूएम है, जो इन सभी जलाशयों की कुल क्षमता का सबसे बड़ा हिस्सा है। इसमें 267.700 एमसीयूएम पानी मौजूद है। यानी करीब 64.5 फीसदी जलभराव है और 147.430 एमसीयूएम क्षमता खाली है। एक्सपर्ट सोनी- जल प्रबंधन मानसून की वास्तविकता को देख करना चाहिए सिंचाई विभाग के सेवानिवृत अधीक्षण अभियंता जीपी सोनी बताते है कि उदयपुर का जल प्रबंधन मानसून की इस वास्तविकता को देख कर किया जाना चाहिए पर ऐसा हो नहीं रहा है। साल के बीच में ही (मार्च, मई आदि में) देवास योजना का पानी पिछोला में लाया जाता है जिससे झीलों का जल स्तर ऊंचा रहता है। इस स्थिति में बरसात में झीलें जल्दी भर जाती हैं और काफी पानी ओवरफ्लो हो जाता है। यदि ऊपर की झीलों का पानी वहीं बचा कर रखा जाता तो आज यह समस्या इतने बड़े रूप में नहीं होती। वे बताते है कि 1971-73 में देवास चरण 1 से 4 इस सोच से बनाए थे कि लगातार दो अनावृष्टि के साल आने पर भी उदयपुर पानी की कमी को न झेले। हमने चारों चरणों में से दो को पूरा करने में पचास साल लगा दिए अब तीसरे चौथे चरण का काम चल रहा है। यह देरी समस्या का मूल कारण है। ऐसे कम वर्षा के साल पहले भी आते रहे हैं और 48 घंटे मे पानी देने से काम चला है। इस साल भी चलेगा। अनावृष्टि के साल में बड़ी झील से पानी लेने की परम्परा है जो इस साल भी अपनाई जानी चाहिए।
फरवरी तक झीलों में बहुत कम हो जाएगा पानी कम बारिश से फतहसागर और पिछोला झील खाली हैं। इन्हें गर्मियों से पहले (मार्च में) भरने के लिए आकोदड़ा, अलसीगढ़ और मादड़ी बांधों से लाया जाने वाला पानी सितंबर में ही ला चुके हैं। यानी अब गर्मियों के लिए इंतजाम नहीं है। अभी पिछोला का जलस्तर महज 7.11 फीट है। यह 11 फीट क्षमता से करीब 3 फीट खाली है। दूसरी ओर फतहसागर की क्षमता 13 फीट है और अभी इसमें करीब 7 फीट ही पानी है।
जल संसाधन अधिकारियों के अनुसार फरवरी 2027 के आखिर तक पिछोला का जलस्तर करीब 3 फीट और फतहसागर का करीब 1 फीट रह जाएगा। जानें अब आगे क्या होगा अब इन जलाशयों में वैसे ही पानी की कमी है और गर्मी की ओर बढ़ते महीनों में लगातार खपत से जलस्तर घटेगा। दूसरी तरफ बागोलिया, आकोदड़ा और घासा जैसे कम भरे जलाशयों के लिए आगे बारिश का हर दौर महत्वपूर्ण रहेगा। आगे पर्याप्त बारिश की उम्मीद कम है ऐसे में इनमें पानी की कमी और होगी। अगस्त तक का प्लान बनाया जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग के अधीक्षण अभियंता रविंद्र कुमार चौधरी ने बताया-वर्षा ऋतु 2026 में कम वर्षा होने के कारण सतही जल स्रोतों में पानी की आवक नगण्य रही। उपलब्ध पानी से माह अगस्त 2026 तक जलापूर्ति सुचारू बनाए रखने के लिए की गई गणना के आधार पर जलापूर्ति का अंतराल बढ़ाने का निर्णय करना पड़ा।