वन विभाग द्वारा किए गए 20 जिलों के वन मंडलों के पुनर्गठन ने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भास्कर ने इसका विश्लेषण किया तो चौंकाने वाली जानकारी सामने आई। सलूंबर जिले की सबसे छोटी सेमारी रेंज (35.36 वर्ग किमी) का वन क्षेत्र पूरे फलोदी जिले (33.50 वर्ग किमी वन क्षेत्र) से भी बड़ा है। जहां फलोदी में इतने से जंगल के लिए एक डीएफओ और 4 रेंजर तैनात हैं, वहीं इससे 21 गुना अधिक 734.47 वर्ग किमी वन वाले सलूंबर की निगरानी का जिम्मा भी महज इतने ही अफसरों पर है। यही असमानता नागौर और डीग में भी है। 25.51 वर्ग किमी वन क्षेत्र वाले नागौर में 3 रेंजों के साथ डीएफओ और 3 रेंजर मौजूद हैं, जहां मेड़ता रेंज सिर्फ 1.9 वर्ग किमी की है। दूसरी ओर 72.13 वर्ग किमी में फैले डीग के वन क्षेत्र को भी समान अमला संभाल रहा है। बता दें कि विभाग ने पुनर्गठन की अधिसूचना गत 30 जुलाई को जारी की थी। भौगोलिक चुनौती : अरावली का सघन जंगल बनाम मरुस्थल का खाली ढांचा सलूंबर-उदयपुर अंचल में अरावली का सघन जंगल, दुर्गम पहाड़ियां और वन्यजीव फैले हैं। यहां जयसमंद, फुलवारी की नाल और सीतामाता जैसी 3 बड़ी सेंचुरी की सुरक्षा का भी दबाव है। जहां जंगल का घना जाल है, वहां संसाधनों की कमी है। वहीं दूसरी ओर, मरुस्थलीय व मैदानी जिलों में वन सीमित होने के बावजूद अफसरों और दफ्तरों का पूरा अमला तैनात है। पुनर्गठित वन मंडलों का इलाका एक्सपर्ट : प्रशासनिक सीमा से बिगड़ा संतुलन सेवानिवृत्त सीसीएफ राहुल भटनागर के अनुसार पहले एक डीएफओ के पास कई जिलों के वन क्षेत्रों का चार्ज होता था। बाद में प्रशासनिक सीमाओं के अनुसार वन सीमा तय की गई। इससे कई वन मंडलों में बहुत कम वन क्षेत्र रह गया। जिन जिलों में वन क्षेत्र कम हैं, वहां पंचायतों की जमीन, सड़क किनारे पौधरोपण जैसे सामाजिक कार्य ज्यादा होते हैं और वन सुरक्षा से जुड़े काम कम होते हैं। वहीं ज्यादा वन क्षेत्र वाले जिलों में सुरक्षा पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है।