केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण (एआईएसएचई) 2023-24 की रिपोर्ट के अनुसार देश में राजस्थान सर्वाधिक विश्वविद्यालय नेटवर्क वाला राज्य बन गया है। प्रदेश में 52 राज्य निजी, 26 राज्य सरकारी, 7 डीम्ड विश्वविद्यालय और 5 राष्ट्रीय महत्व के संस्थान (आईआईटी जोधपुर, आईआईएम उदयपुर, एमएनआईटी जयपुर) मिलाकर कुल 90 यूनिवर्सिटी स्तर के संस्थान संचालित हैं। इस बड़े शैक्षणिक ढांचे को मजबूती देने में उदयपुर स्थित भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम), महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमपीयूएटी) और मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय (सुविवि) जैसे प्रमुख संस्थान अहम भूमिका निभा रहे हैं। बढ़ता दायरा: 606 कॉलेजों के साथ जयपुर देश में दूसरे नंबर पर राष्ट्रीय स्तर पर कुल छात्र नामांकन 4.50 करोड़ के ऐतिहासिक आंकड़े पर पहुंच गया है, जो 2014-15 (3.42 करोड़) की तुलना में 31.5% की वृद्धि दर्ज कराता है। देश में 18-23 आयु वर्ग का सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) बढ़कर 30.0 हो गया है, जिसमें महिलाओं का अनुपात (31.2) पुरुषों (28.8) से आगे है। राजस्थान कुल नामांकन के मामले में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और बिहार के साथ देश के शीर्ष 7 राज्यों में शामिल है, जो मिलकर देश के उच्च शिक्षा नामांकन का 59% हिस्सा संभालते हैं। प्रदेश में प्रति लाख आबादी पर 47 कॉलेज का घनत्व है, जो कर्नाटक (51) और केरल (50) के करीब है। वहीं, जयपुर जिला 606 कॉलेजों के साथ देशभर में केवल बेंगलुरु शहरी के बाद दूसरे स्थान पर है। सरकारी यूनिवर्सिटीज में बेटियां आगे राज्य के 26 सरकारी विश्वविद्यालयों में 50.2% महिला नामांकन के साथ छात्राएं पुरुषों से आगे हैं, जबकि निजी विश्वविद्यालयों में पुरुष छात्रों का दबदबा है। राष्ट्रीय स्तर पर एसटीईएम क्षेत्रों में 1.02 करोड़ से अधिक छात्र नामांकित हैं, जिनमें महिलाओं की भागीदारी 44% है। राजस्थान में भी बीएससी-एमएससी में छात्राएं बेटों के बराबर हैं, लेकिन बीटेक में इनकी भागीदारी 28% से 30% के बीच है। सामाजिक समावेशन के मोर्चे पर 5 वर्षों में राज्य में एसटी के छात्रों के नामांकन में 33% से अधिक की वृद्धि हुई है। जनजाति बहुल उदयपुर संभाग में सुविवि और क्षेत्रीय कॉलेजों में एससी-एसटी की छात्राओं की बढ़ती उपस्थिति इसका प्रमाण है। धार्मिक व भाषाई अल्पसंख्यकों (विशेषकर मुस्लिम) का उच्च शिक्षा में नामांकन दर आबादी के अनुपात में अब भी कम है। हर साल 8 लाख स्नातक निकल रहे, पर दफ्तरी नौकरियां सीमित एआईएसएचई और आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) के आंकड़ों का मिलान एक बड़ा विरोधाभास उजागर करता है। राज्य के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से हर साल लगभग 8 लाख से अधिक छात्र स्नातक बनकर निकलते हैं, जिनमें से 50% से अधिक छात्र सामान्य कला (आर्ट्स) व मानविकी संकाय के होते हैं। राज्य में सामान्य बेरोजगारी दर 4.7% है, लेकिन डिग्रीधारक युवाओं में शिक्षित बेरोजगारी दर देश में सबसे ऊंचे स्तरों में से एक है। इसका मुख्य कारण अर्थव्यवस्था का सफेदपोश (दफ्तरी) नौकरियों के बजाय छोटे व अनौपचारिक उद्यमों पर टिका होना है। स्थानीय अवसर कम होने से 44% से अधिक शिक्षित महिला स्नातक प्रभावित हैं। हालांकि सरकार आई-स्टार्ट और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के तहत व्यावसायिक प्रशिक्षण जोड़कर इसे सुधारने का प्रयास कर रही है। डॉ. गिरिराज सिंह चौहान, विभागाध्यक्ष, लोक प्रशासन, सुविवि