जिले में पंचायत चुनाव और शिक्षा विभाग के शैक्षणिक सत्र के बीच सीधा टकराव होता नजर आ रहा है। एक तरफ जहां धनतेरस और दीपावली के त्योहारों के बीच चुनाव कार्यक्रम ने शिक्षकों और कर्मचारियों की सांसें अटका रखी हैं, वहीं दूसरी ओर 15 अक्टूबर से 29 अक्टूबर तक निर्धारित अर्द्धवार्षिक परीक्षाओं ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। सबसे खास बात यह है चुनाव कराने से पहले कई प्रकार के प्रशिक्षण होते हैं, इसमें सरकारी विद्यालय के शिक्षकों की ड्यूटी लगती है। क्योंकि इस बार दो तरह से चुनाव होने हैं, ऐसे में ड्यूटी भी अधिक शिक्षकों की लगाई जाएगी। बैलेट पेपर से भी चुनाव होने हैं और ईवीएम से भी।​ इस बार प्रतापगढ़ जिले को अपना चौथा जिला प्रमुख मिलेगा, जो कि जनजाति वर्ग से महिला होगी। ​ हाल ही में अरनोद रोड स्थित भाजपा जिला कार्यालय पर हुई महत्वपूर्ण बैठक में राष्ट्रीय महामंत्री हरीश द्विवेदी मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए थे। रणनीतिक टीम में राजस्व मंत्री हेमंत मीणा, सांसद सी.पी. जोशी, सहकारिता मंत्री गौतम कुमार दक, जिला प्रभारी बंशीलाल खटीक और जिलाध्यक्ष महावीर सिंह मोर्चा संभाले हुए हैं। इन पांच दिग्गजों की देखरेख में टिकट वितरण से लेकर सोशल इंजीनियरिंग के समीकरण साधे जा रहे हैं। पार्टी सूत्रों का कहना है कि जिला प्रमुख की कुर्सी के लिए भाजपा में भीतरखाने कई ध्रुव सक्रिय हैं, लेकिन टिकट उसी को मिलेगा जिसकी पकड़ संगठन और शीर्ष नेतृत्व दोनों स्तरों पर मजबूत होगी। ​दूसरी ओर, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस खेमे में भी खामोशी के बावजूद अंदरखाने बैठकों का दौर जारी है। कांग्रेस की पूरी रणनीति और चुनाव संचालन का मुख्य जिम्मा पूर्व विधायक रामलाल मीणा ने अपने कंधों पर उठाया हुआ है। उनको जिलाध्यक्ष दिग्विजय सिंह का पूरा साथ मिला हुआ है। पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं को साधने और बागी तेवरों को थामने के लिए वे लगातार चुनावी व्यूह रचना तैयार कर रहे हैं। जो अपने सियासी संपर्कों के बूते टिकट पाने के लिए बड़े नेताओं की चौखट पर माथा टेक रहे हैं। ​शिक्षक संघों का कहना है कि चुनाव से पहले मतदान दलों का प्रशिक्षण, ईवीएम प्रबंधन, अन्य प्रशासनिक कार्य अनिवार्य रूप से होते हैं। ऐसे में जब एक तरफ शिक्षक, कर्मचारी परीक्षा की तैयारियों, पेपर सेट करने और व्यवस्थाओं में व्यस्त होंगे, वहीं दूसरी तरफ उन्हें चुनावी प्रशिक्षण और ड्यूटी के लिए भी खींचा जाएगा। शिक्षकों और कर्मचारियों पर इस समय तीन तरफ से भारी दबाव बना हुआ है। .​पहली चुनौती (परीक्षाएं): 15 से 29 अक्टूबर तक चलने वाली अर्द्धवार्षिक परीक्षाएं, जो विद्यार्थियों के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। ​.दूसरी चुनौती (चुनाव ड्यूटी): पंचायत चुनाव के पहले और दूसरे चरण की तारीखों का परीक्षाओं की तिथियों के साथ सीधे तौर पर टकराना। .​तीसरी चुनौती (प्रशिक्षण और त्योहार): चुनाव से पहले के प्रशिक्षण कार्य और ठीक उसी समय आने वाले धनतेरस व दीपावली जैसे बड़े पर्व। ​​शिक्षक बोले कि निर्वाचन विभाग, शिक्षा विभाग को आपसी समन्वय बनाकर इस शेड्यूल पर पुनर्विचार करना चाहिए। यदि बदलाव नहीं किया गया, तो न केवल शिक्षण प्रभावित होगा, बल्कि परीक्षा, चुनाव दोनों की साख पर असर पड़ेगा।