टोंक सहित प्रदेश के कई जिलों में सरकारी कार्यप्रणाली को लेकर शिक्षकों में रोष बढ़ रहा है। शिक्षकों का कहना है कि सरकारी स्कूलों के शिक्षकों का काम बच्चों को पढ़ाना है, लेकिन आजकल उनका ज्यादातर समय मोबाइल और कंप्यूटर पर जानकारी अपलोड करने में ही बीत रहा है। बच्चों की हाजिरी से लेकर परीक्षा के नंबर, दोपहर का खाना (मिड-डे-मील), छात्रवृत्ति और पौधरोपण तक की हर छोटी-बड़ी जानकारी ऑनलाइन दर्ज करनी पड़ रही है। इसके कारण बच्चों की पढ़ाई भी बाधित हो रही है। स्कूल का एक घंटा ऑनलाइन काम में बर्बाद शिक्षकों का कहना है कि स्कूल के साढ़े पांच घंटे में से करीब एक घंटा सिर्फ ऑनलाइन रिपोर्ट भेजने में निकल जाता है। कई बार गांवों में इंटरनेट नहीं चलता या सरकारी वेबसाइट बहुत धीमी हो जाती है। अगर समय पर जानकारी अपलोड न हो तो बड़े अधिकारियों के नोटिस का डर रहता है, और अगर बच्चों की पढ़ाई छूट जाए तो भी गाज शिक्षकों पर ही गिरती है। एक शिक्षक वाले स्कूलों में सबसे ज्यादा परेशानी टोंक जिले के 1447 स्कूलों में से 50 से ज्यादा स्कूल ऐसे हैं जहां सिर्फ एक ही शिक्षक है। वहीं 100 से ज्यादा स्कूलों में सिर्फ दो या तीन मास्टर हैं। अब एक अकेला शिक्षक सभी कक्षाओं के बच्चों को संभाले, उन्हें पढ़ाए या दिनभर मोबाइल पर रिपोर्ट भरता रहे? ऑनलाइन रिपोर्टिंग पर सवाल उठाए खुद के पैसों से करा रहे मोबाइल रीचार्ज शिक्षक संघ (रेसटा) के प्रदेशाध्यक्ष मोहर सिंह सलावद ने बताया कि सरकार काम तो ऑनलाइन करवा रही है, लेकिन इसके लिए शिक्षकों को न तो मोबाइल दिए गए हैं और न ही इंटरनेट का पैसा। शिक्षकों को अपने निजी मोबाइल और अपने पैसों से रीचार्ज करवाकर सरकारी काम करना पड़ता है। नेटवर्क न मिलने पर स्कूल के बाद घर जाकर रात में काम पूरा करना पड़ता है। शिक्षक नेताओं का कहना है कि बार-बार अलग-अलग ऐप पर एक ही जानकारी मांगने के बजाय एक ही व्यवस्था बनाई जाए। शिक्षकों को डेटा एंट्री ऑपरेटर बनाने के बजाय पढ़ाने दिया जाए, ताकि बच्चों का भविष्य सुधर सके।