राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर (आरआईसी) जयपुर की आर्ट गैलरी इन दिनों भारतीय कला की समृद्ध विरासत और उसके बदलते स्वरूप की अनूठी झलक पेश कर रही है। यहां की आर्ट गैलरी में लीजेंडरी मास्टर्स ऑफ इंडियन आर्ट शीर्षक से विशेष कला प्रदर्शनी और बिक्री का आयोजन किया जा रहा है। यह प्रदर्शनी 20 सितंबर तक चलेगी। इसकी क्यूरेटर निखत अंसारी हैं। प्रदर्शनी में देश के करीब 35 प्रसिद्ध और वरिष्ठ कलाकारों की कलाकृतियां प्रदर्शित की गई हैं। खास बात यह है कि इनमें राजस्थान के 17 ऐसे कलाकारों की कृतियां भी शामिल हैं, जिन्होंने भारतीय कला जगत में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। प्रदर्शनी में दर्शकों और कला प्रेमियों को एक ही स्थान पर कई दशकों के दौरान तैयार की गई महत्वपूर्ण और दुर्लभ कलाकृतियों को देखने के साथ उन्हें खरीदने का अवसर भी मिल रहा है। छह दशकों की कला यात्रा एक ही छत के नीचे प्रदर्शनी की खासियत इसका विस्तृत कालखंड है। यहां 1950, 1960, 1970 और 1980 के दशकों में तैयार की गई कलाकृतियों से लेकर बाद के दौर की कृतियां भी देखने को मिल रही हैं। इस तरह यह प्रदर्शनी केवल कलाकृतियों की प्रदर्शनी नहीं, बल्कि आधुनिक और समकालीन भारतीय कला के विकास की यात्रा को भी सामने रखती है। पेंटिंग से लेकर मूर्तिकला, लिथोग्राफ, वुडकट, ड्रॉइंग और कागज पर बनाई गई विभिन्न कलाकृतियों को यहां स्थान दिया गया है। कई पुरानी और दुर्लभ कृतियां अपनी ऐतिहासिक महत्ता के कारण खास आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। कला संग्रहकर्ताओं के लिए भी यह प्रदर्शनी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां अलग-अलग पीढ़ियों और शैलियों के कलाकारों की कृतियां एक साथ देखने को मिल रही हैं। यहां देखिए इवेंट के PHOTO'S… 1958 की ‘श्रृंगार’ कृति ने बटोरी चर्चा प्रदर्शनी में दिवंगत प्रो. देवकीनंदन शर्मा की वर्ष 1958 में वॉश तकनीक से बनाई गई ‘श्रृंगार’ विशेष आकर्षण बनी हुई है। यह कलाकृति उनके चित्रण कौशल और विशिष्ट कला दृष्टि को सामने लाती है। उनके साथ उनके पुत्र प्रो. भवानी शंकर शर्मा की कलाकृतियां भी प्रदर्शनी का हिस्सा हैं, जिससे पिता-पुत्र की कला परंपरा को एक साथ देखने का अवसर मिलता है। राजस्थान की कला विरासत के महत्वपूर्ण नाम कृपाल सिंह शेखावत की ‘पाबूजी राठौड़’ भी दर्शकों का ध्यान खींच रही है। टेम्परा माध्यम में बोर्ड पर बनाई गई यह कृति उनकी विशिष्ट शैली और बारीक शिल्प कौशल को प्रदर्शित करती है। दिवंगत राजस्थानी कलाकार डॉ. एमके शर्मा सुमहेन्द्र की बनी-ठनी की कलाकृति राजस्थान की पारंपरिक चित्रकला की खूबसूरती को सामने लाती है। टेम्परा माध्यम में कपड़े पर तैयार की गई यह कृति बनी-ठनी परंपरा के सौंदर्य और आकर्षण को अपने अंदाज में प्रस्तुत करती है। 30 लाख रुपए का स्कल्प्चर प्रदर्शित प्रदर्शनी में ऊषा रानी हुजा का दुर्लभ स्कल्प्चर भी खास चर्चा में है। बताया गया है कि यह कलाकृति 1955 से 1965 के बीच तैयार की गई थी। अपनी दुर्लभता और कलात्मक महत्व के कारण यह प्रदर्शनी की प्रमुख कृतियों में शामिल है और इसकी कीमत करीब 30 लाख रुपए बताई गई है। यहां दिवंगत मूर्तिकार हिम्मत शाह का स्कल्प्चर भी दिखाया गया है, जिसकी कीमत भी 30 लाख रुपए है। राजस्थान के प्रसिद्ध कलाकार मोहन शर्मा की कलाकृतियां भी यहां प्रदर्शित हैं। राजस्थान की कला विरासत में उनके योगदान के चलते उन्हें ‘राजस्थान के चार रत्नों’ में विशेष स्थान दिया जाता है। उनकी कृतियां कला प्रेमियों और संग्रहकर्ताओं के लिए विशेष आकर्षण बनी हुई हैं। के. जी. सुब्रमण्यम की कृतियों को मिले खरीददार प्रदर्शनी में के. जी. सुब्रमण्यम की वर्ष 1996 की लिथोग्राफी कृति भी प्रदर्शित की गई है। उनकी तीन पेंटिंग्स को यहां स्थान दिया गया था और प्रदर्शनी के दौरान तीनों के बिक जाने की जानकारी सामने आई है। ये कृतियां तीन लाख 40 हजार रुपए में सेल की गई है। ज्योति स्वरूप की 1962 में इंक और वाटर कलर से बनाई गई कलाकृति भी अपने विशिष्ट अंदाज के कारण दर्शकों का ध्यान आकर्षित कर रही है। शैल चोयल की ‘कृष्णा’ में दिखी अलग कथा कलाकार शैल चोयल ने अपनी विशिष्ट शैली में ‘कृष्णा’ नाम से पेंटिंग प्रदर्शित की है। इसमें जंगल में लगी आग के बीच भगवान कृष्ण को गायों के साथ दिखाया गया है। चित्र में कृष्ण बांसुरी की धुन के माध्यम से गायों को सुरक्षित किनारे की ओर ले जाते हुए नजर आते हैं। यह कृति पौराणिक प्रसंग को कलाकार की अपनी दृश्य भाषा में प्रस्तुत करती है। 55 बांसुरियों से बना हृदय की धड़कन का इंस्टालेशन प्रदर्शनी में जाने-माने संगीतकार और कलाविद डॉ. अश्विन एम. दलवी का अनूठा इंस्टालेशन भी आकर्षण का केंद्र है। कर्नाटक की पारंपरिक वेणु बांसुरियों से तैयार इस कलाकृति में स्वस्थ हृदय की धड़कन का संकेत देने वाली कार्डियोग्राम आकृति को उकेरा गया है। 55 बांसुरियों से तैयार यह इंस्टालेशन देखने में एक सधी हुई ग्राफिक आकृति का आभास देता है, लेकिन इसके पीछे संगीत और हृदय के बीच के गहरे रिश्ते की अवधारणा है। कलाकार ने इसके साथ लिखा है बांसुरी भीतर के शून्य से गढ़ी जाती है, और उसी शून्य से जीवन की सबसे निर्मल और स्वस्थ लय फूटती है। सूर्यदेव से लेकर टेराकोटा तक केरल की कलाकार रत्नावली के. पी. की ‘सूर्य देवन’ नामक पेंटिंग भी प्रदर्शनी की उल्लेखनीय कृतियों में शामिल है। म्यूरल शैली में तैयार इस कलाकृति में सूर्यदेव को सात घोड़ों पर सवार दिखाया गया है। वहीं एमिनेंट कलाकार चंद्रशेखर सेन की टेराकोटा कलाकृतियां भी अपनी बनावट और शैली के कारण दर्शकों का ध्यान खींच रही हैं। हुसैन से जोगेन चौधरी तक दिग्गजों की मौजूदगी प्रदर्शनी में एम. एफ. हुसैन, हिम्‍मत शाह, के. जी. सुब्रमण्यन, पी. एन. चोयल, सुहास रॉय, कृपाल सिंह शेखावत, डॉ. सुमहेंद्र शर्मा, प्रो. देवकीनंदन शर्मा, ज्योति स्वरूप, मोहन शर्मा, धीरज चौधरी, जोगेन चौधरी, पद्मश्री शाकिर अली, शैल चोयल, अखिलेश वर्मा, समीर ऐच, अजित सील, शब्बीर हसन काजी, प्रो. भवानी शंकर शर्मा, समदार सिंह खंगारोत, सुब्रतो मंडल, जय झारोटिया, अंकित पटेल, गिरिराज शर्मा, संजीब गोगोई, सलील सहानी, रघु नवारिया, जयंती रबारी, डॉ. नंदलाल ठाकुर, पी. सी. किशन, डॉ. अश्विन एम. दलवी, केतकी रॉय चौधरी, रत्नावली के. पी., रामगोपाल कुमावत और चंद्रशेखर सेन सहित अनेक कलाकारों की कलाकृतियां प्रदर्शित की गई हैं।