नमाना कस्बे में चल रही शिव कथा के पांचवे दिन महर्षि अत्रि और माता अनसूया का प्रसंग आया। कथावाचक राधे महाराज ने श्रद्धालुओं को बताया कि माता अनसूया अपने पतिव्रत धर्म, तप, त्याग और सेवा के लिए प्रसिद्ध थीं। उनकी पवित्रता तीनों लोकों में जानी जाती थी। उन्होंने कहा कि माता अनसूया की परीक्षा लेने के लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश साधु का रूप धारण कर महर्षि अत्रि के आश्रम पहुंचे। उन्होंने माता अनसूया से एक ऐसी शर्त पर भिक्षा मांगी, जिसे पूरा करना उनके लिए मुश्किल था। माता अनसूया ने अपनी तपशक्ति और पतिव्रत धर्म के प्रभाव से तीनों देवताओं को बाल रूप में बदल दिया। इसके बाद उन्होंने बच्चों की तरह उन्हें भिक्षा दी। जब तीनों देवता वापस नहीं लौटे, तो देवियों को चिंता हुई। तब माता अनसूया ने उन्हें उनके असली स्वरूप में वापस कर दिया। तीनों देवताओं ने माता अनसूया के तप, पवित्रता और पतिव्रत धर्म से खुश होकर उन्हें वरदान दिया। इसी वरदान के कारण भगवान दत्तात्रेय का जन्म माता अनसूया और महर्षि अत्रि के घर हुआ। भगवान दत्तात्रेय को ब्रह्मा, विष्णु और महेश की मिली-जुली शक्ति का रूप माना जाता है। राधे महाराज ने आगे बताया कि भगवान दत्तात्रेय का जीवन हमें गुरु-तत्व, ज्ञान, वैराग्य, सेवा और प्रकृति से सीखने की प्रेरणा देता है। भगवान दत्तात्रेय ने संसार की कई चीजों और जीवों को अपना गुरु मानकर उनसे जीवन के खास संदेश लिए।