भास्कर न्यूज | रेलमगरा जैन परंपरा का पर्वाधिराज पर्युषण केवल आठ दिनों की आराधना नहीं, बल्कि आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप की ओर लौटाने का महापर्व है। यह इच्छाओं की पूर्ति नहीं, बल्कि उन पर संयम और प्रभुत्व स्थापित करने का अवसर है। ये विचार श्रमणसंघीय युवाचार्य महेंद्र ऋषि ने भीलवाड़ा के शांतिभवन में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए। युवाचार्य ने कहा कि भारतीय संस्कृति में अनेक पर्व हैं, लेकिन पर्युषण की महत्ता इसलिए सर्वोपरि है कि इसमें बाहरी वैभव नहीं, बल्कि आत्मा स्वयं आराधना का केंद्र बनती है। यह भीतर की सामर्थ्य पहचानने और चैतन्य तत्व को जागृत करने का अवसर है। पर्युषण आत्मकल्याण के साथ जीवमात्र के प्रति आत्मीयता और अभयभाव जगाता है। सचित्त आहार, हरित वनस्पति और बड़े स्नान जैसे त्यागों के पीछे भी यही भावना है कि हमारे कारण किसी जीव को भय या पीड़ा न पहुंचे। उन्होंने कहा कि मनुष्य इच्छाओं की अनवरत दौड़ में उलझा रहता है। एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी सामने आ जाती है। उपवास, आयंबिल, एकासन, रात्रि भोजन त्याग और प्रत्याख्यान आत्मनियंत्रण की साधनाएं हैं। युवाचार्य ने कहा कि क्रोध, आग्रह और आसक्ति को मनुष्य अपना स्वभाव मान लेता है, जबकि आत्मा का वास्तविक स्वरूप ज्ञाता-द्रष्टा है। कषाय और आदतों के आवरण आत्मा के प्रकाश को ढक देते हैं। पर्युषण इन्हें हटाने की साधना है। उन्होंने आठ दिनों में तप, जप, त्याग, सामायिक, स्वाध्याय, ध्यान, प्रतिक्रमण और जिनवाणी श्रवण से जुड़ने का आह्वान किया। कहा कि पर्युषण की सार्थकता भीतर आए परिवर्तन में है।