भ्रूण लिंग जांच के खिलाफ अभियान में धमकियों, दबाव और लाखों रुपए के प्रलोभन के बावजूद सामाजिक कार्यकर्ता एवं गांधीवादी विचारक राजन चौधरी पीछे नहीं हटे। झुंझुनूं जिले के हनुमानपुरा निवासी चौधरी के अनुसार प्रदेश में हुए 114 डिकॉय ऑपरेशन में वे किसी न किसी रूप में शामिल रहे। इस अभियान में करीब 6.5 लाख बच्चियों को बचाने में योगदान रहा। 2003 में जनगणना के आंकड़ों ने झकझोरा, इसके बाद अभियान की शुरुआत की 2001 जनगणना के आंकड़े 2003 में सामने आए। लिंगानुपात 946 महिलाएं प्रति 1000 पुरुष था, लेकिन 0-6 आयु वर्ग में घटकर 863 बालिकाएं प्रति 1000 बालक रह गया था। प्रदेश में इसी आयु वर्ग का लिंगानुपात 909 था। 2011 की जनगणना में प्रतिदिन 218 बेटियां कम पैदा होती थीं। 2014 के बाद संख्या प्रतिदिन 100 रह गई यानी रोज 118 बेटियां बचाई जाने लगी। चौधरी के अनुसार पीसीटीएस आंकड़ों के आधार पर 6.5 लाख बेटियां बचाने में सफलता मिली। तकनीक के दुरुपयोग के खिलाफ मिशन; चौधरी के अनुसार चुनौती सिर्फ भ्रूण जांच कराने वालों तक सीमित नहीं थी, बल्कि उस सोच के खिलाफ थी जिसमें तकनीक का इस्तेमाल गर्भस्थ शिशु के लिंग के आधार पर भेदभाव के लिए किया जाता है। अभियान रोकने के लिए रिश्तेदारों के जरिए दबाव, धमकी व 10 से 50 लाख रुपए के प्रलोभन दिए गए।